बुधवार, 27 सितंबर 2017

मिलिए मिथिला,मिथिलावासी और मिथिला की धरोहर से : मिथिला के विरासत

नई श्रृंखला शुरू कर रहे है शायद हमारे श्रृंखलाओं की पहले कड़ी है मिथिला की विरासत को दर्शाने के लिए नई शुरुआत

बिहार के दरभंगा जिले में काली रूप में मां श्यामा बड़े ही भव्य रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह मंदिर ने केवल चिता पर बना है, बल्कि मंदिर के अंदर हर तरह के मागंलिक कार्य भी किए जाते हैं.
बिहार के दरभंगा जिले में मां काली का यह भव्य मंदिर मौजूद है, जिन्हें यहां भक्त श्यामा माई के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर के निर्माण की कहानी जिसे सुनकर सब हैरान हो जाते हैं. मां काली का यह मंदिर दरभंगा राज परिवार के महान साधक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. इस मंदिर के अंदर दक्षिण दिशा की ओर एक खास स्थान पर आज भी लोग साधक महाराज रामेश्वर सिंह के चिता की तपिस को महसूस करते हैं, फिर चाहे कड़ाके की ठंड ही क्यों न पड़ रही हो.

यहां के लोगों का मानना है कि पूरे भारत में काली की इतनी बड़ी मूर्ति कहीं नहीं है. मूर्ति का विग्रह अलौकिक और अविस्मरणीय है. भक्तों को मां श्यामा के दर्शन से ही अदभुत सुख की प्राप्ति होती है. कहते है अगर भक्त नम आंखो से कुछ मांगते हैं तो उनकी इच्छा अवश्य पूरी होती है. इस विशालकाय मंदिर की स्थापना 1933 में दरभंगा महाराजा कामेश्वर सिंह ने की थी, जिसमें मां श्यामा की विशाल मूर्ति भगवन शिव की जांघ एवं वक्षस्थल पर अवस्थित है. मां काली की दाहिनी तरफ महाकाल और बायीं ओर भगवान गणेश और बटुक की प्रतिमाएं स्थापित हैं. चार हाथों से सुशोभित मां काली की इस भव्य प्रतिमा में मां के बायीं ओर के एक हाथ में खड्ग, दूसरे में मुंड तो वहीं दाहिनी ओर के दोनों हाथों से अपने पुत्रों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में विराजमान हैं.

मां श्‍यामा के दरबार में होने वाली आरती का विशेष महत्व है. माना जाता है कि जो भी मां की इस आरती का गवाह बन गया उसके जीवन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं, साथ ही भक्तों की समस्त मनोकामना भी पूरी हो जाती है. मंदिर के गर्भगृह में जहां एक तरफ काली रूप में मां श्यामा के भव्य दर्शन होते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रार्थना स्थल के मंडप में सूर्य, चंद्रमा ग्रह, नक्षत्रों सहित कई तान्त्रिक यंत्र मंदिर की दीवारों पर देखने को मिलते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस मंदिर में मां श्यामा की पूजा तांत्रिक और वैदिक दोनों ही रूपों में की जाती है.

आमतौर पर हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार यह परंपरा रही है की किसी भी व्यक्ति का कोइ भी मांगलिक संस्कार होने के एक साल तक वह श्‍मशान नहीं जाता है, लेकिन मां श्यामा के इस मंदिर में नए जोड़े मां का आशीर्वाद ही लेने नहीं बल्कि श्मसान भूमि पर बने इस मंदिर अनेकों शादियां भी होती है.

जय मिथिला,जय मैथिल

गांव,गांव के लोग और गांव का इंटरनेट

गांव का ब्लॉग है यहां गांव और गांव से जुड़ी वो बाते होती है जिनसे हम और आप खुद को जोड़ते है।
गांव का नाम सुनकर लोगो के में में ये तस्वीर उभरती है कि कैसे गांव में लोग गंदगी में रहते है, जानवरों के पास सोते है लेकिन बीते कुछ सालों में सचमुच गांव का रहन–सहन बदला,गांव की तस्वीर बदली है और तो और गांव के लोगो को भी बदलते देखा है हमने।
पहले गांव में बिजली नहीं थी शाम को दुकानों पर युवाओं का हुजूम उमड़ता था,राजनीति पर संसद बैठता था लोग अपना राय रखते थे और खूब मजा आता था जोकि व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी पसंद था और मेरा मानना है कि आज मै जो भी चुतियपा कर रहा हूं उसी की देन है लेकिन अब लोगो मै वो उत्साह नहीं रहा हर कोई टीवी और बीवी में व्यस्त है।
उस समय की बात याद आती है जब भी हम कभी घर से बाहर निकलते थे हमे कोई ना कोई साथी मिलता था जिसके साथ हम गप्पे मार सकते थे, बक्चोदी कर सकते लेकिन अब वो दोस्त कहीं खो गए है,अब गांव में वो मजा नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था और इन बातो से मै ये समझता हूं कि सचमुच मेरा देश बदल रहा है लेकिन  बदलाव से मै खुश नहीं हूं,इसमें मुझे वो भारत नहीं दिखता हो मैंने कभी देखा था और आज भी मन में खयाल आता है बचपन के दिन भले थे कितने

अब गांव में हर कोई इंटरनेट का प्रयोग करता है लेकिन उस इंटरनेट से बस पोर्न और यूट्यूब का ट्रेडिंग चूतियापा ही देखता है

सोमवार, 25 सितंबर 2017

छठ की तैयारी

छठ मतलब बिहार का सबसे बड़ा पर्व,वो पर्व जिसके लिए लोग सबसे ज्यादा बेताब होते थे,वो पर्व जिसमें हम सब एक जगह होते थे लेकिन उस पर्व के प्रति लोगों में अब वो उत्साह नहीं रहा जैसा लोगो मै पहले हुआ करता था अब तो हर कोई अपने दरवाजे पर ही छठ माना लेता है  ।

उसी छठ के बारे में आज यू ही लिखने का मन कर गया नेट भी काफी अच्छा चल रहा है आज,तो सुनाते है असली छठ की कहानी जिसे हमने जिया है।

छठ में लोग छठ घाट पर छठ से 15 दिन पहले से आना शुरू कर देते है मेरा घर बिल्कुल घाट के पास है वो भी बाबा बैकुंठ नाथ की गोद में है से बचपन से देखता आया हूं कैसे लोग 15 दिन पहले से ही घाट छेकना शुरू कर देते थे लेकिन पिछले तीन चार साल से कोई नहीं आता बस 2 दिन पहले 2 मजदूर लगा कर पूरा साफ़ करवा देते है और फिर 2 टाइम लोग आ कर सूर्य को अर्घ्य देते है और फिर किसको क्या मतलब की घाट पर क्या होता,मै खुद अपनी बात बताता हूं जब मै 8–9 साल का रहा होऊंगा उस टाइम मै और मेरे दोस्त जब सभी घाट से चले जाते थे तब
मोमबत्ती और दीपक चुना करता था और फिर उससे हम खेलते थे लेकिन अब बच्चे हाइजीन ही गए है वो गंदे चीजों को नहीं छूते चुकी वो कूल्ड्यूड है तो वो बस सेल्फी लेते है वो घाट से 30 मीटर दूर रहते है ताकि उनकी सेल्फी सही आए।

पहले हम जब बच्चे तब हम घाट बनाते थे और हम अनंत खुशी मिलती थी लेकिन अब हमारा क्लास नीचा हो जाता।

मेरी किसी से कोई शिकायत तो नहीं बस एक बार से अपने बचपन को जीने की लालसा है

मंगलवार, 11 जुलाई 2017

बचपन के दिन भले थे कितने | एक कविता बिहार से


रविन्द्र प्रसाद जी ने पटनाबीट्स से अपनी एक कविता साझा की है| कविता का शीर्षक हम सबको प्रिय है| इंसान कितना भी आगे निकल जाये एक जो चीज़ हमेशा उसे अपनी ओर खींचती है वो है ‘बचपन’| ये शायद ऐसी उम्र है जो जीवन भर साथ निभाती है| वो शरारतें और खेल-खेल में रूठना-मनाना, सब याद आएगा इस कविता के साथ और शायद कवि का यही मकसद भी रहा हो| एक कविता बिहार से के साथ आज आप भी तलाश लीजिये दिल का वो कोना जो अब भी जीना चाहता है उन्हीं लम्हों को, बार-बार| चलिए अपने ‘बचपन’ की एक सैर करते हैं| पेश है पाठक रविन्द्र प्रसाद जी की प्यारी सी कविता- ‘बचपन’| बचपन
बचपन के दिन भले थे कितने, सोच सकें हम चाहे जितने, बचपन के दिन भले थे कितने| याद है हमको वो झूमती रातें, राजा-रानी, परियों की बातें, ख्वाबों के हम महल में रहते, परी के संग परीलोक भी जाते| वो दिन आज बने हैं सपने, बचपन के दिन भले थे कितने| कंचा-गिल्ली प्रिय थे हमको, लट्टू भी कुछ कम नहीं भाते, धुप में सारा दिवस गंवाते, झूमते-गाते, पतंग उड़ाते| वो दिन आज रहे न अपने, बचपन के दिन भले थे कितने| खेल-खेल में शादी रचाते, झूमते-गाते बारात लाते, सखी कोई दुल्हन बन जाती, सखा हमें सेहरा पहनाते| वो दिन बीत गए अब अपने, बचपन के दिन भले थे कितने| बचपन के दिन भले थे कितने सोच सकें हम चाहे जितने, बचपन के दिन भले थे कितने।।

बुधवार, 7 जून 2017

बागमती की सद्गति

बागमती की सद्गति पुस्तक दिनेश कुमार मिश्र की रचना है और बागमती हमारे लिए जीवन दायिनी नदी हुआ करती थी लेकिन आज से कई साल पहले हमारे लिए काफी बड़ी संकट थी बागमती में आने वाली बाढ़ । दिनेश मिश्र के प्रयासों से उस बागमती पर बाँध तल बनाया गया लेकिन किसानो को सिचाई हेतु नहर का समुचित प्रबंध नहीं किया गया जिसका परिणाम ये हुआ की आज हम खेती में पानी की कमी के कारन काफी पीछे हो गए ।आज पढ़िए दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक बागमती की सद्गति का कुछ अंश पसनद आये तो और भी लोगो को बताये और ज्यादावसे ज्यादा लोगो तक पहुचाये :-

बागमती परियोजना का निर्माण कार्य तीन स्तरों पर हुआ था। पहला निर्माण कार्य 1954-56 के बीच हायाघाट से लेकर बदलाघाट के बीच बनने वाले तटबंधों से शुरू हुआ। यह समय आजादी के लगभग ठीक बाद का था इसलिए उसकी रवानी में समाज और देश के काम आने की ललक हर आदमी में थी। यह वह समय था जब जनता सम्बंधित विभागों की योजनाओं पर विश्वास करती थी। जो नेता थे वह स्वतंत्रता आन्दोलन के तपे-तपाये लोग थे इसलिए उन पर भरोसा न करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। इस तरह से उस समय पुनर्वास के मसले पर न तो आम लोगों की कोई खास अपेक्षाएं थीं और न ही पुनर्वास को लेकर कोई खास झमेला हुआ। किसी को मुआवजे के तौर पर कुछ मिल गया तो ठीक वरना न मिलने पर भी किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की और इसे समाज तथा देश के व्यापक हित में अपना योगदान समझ कर संतोष कर लिया। उस समय के बचे हुए पुराने लोग कहते हैं कि जिस जमीन से होकर तटबंध गुजरा था उस जमीन का मुआवजा उन्हें मिला था और उसके अलावा उन्हें कुछ नहीं मिला। जिनका घर दोनों तटबंधों के बीच में पड़ गया उनमें कुछ को तटबंध के बाहर घर बनाने के लिए कुछ जमीन मिल गयी। घर बनाने के लिए किसी को कोई अनुदान नहीं मिला।

उन दिनों कोसी परियोजना में पुनर्वास का विषय जरूर कुछ चर्चा में आ गया था मगर निर्माणाधीन बागमती और बूढ़ी गंडक नदियों पर बन रहे तटबंध के समय पुनर्वास किसी चर्चा में नहीं था। वहाँ पुनर्वास के मसले को जैसे-तैसे निपटा देने की ही योजना थी। इस मुद्दे पर विधान सभा की कार्यवाही रपट में भी विशेष कुछ नहीं मिलता और निश्चयपूर्वक कुछ कह सकने वाले लोग भी बहुत कम ही बचे हैं। यह तटबंध बन जाने के कई वर्षों बाद 10 फरवरी 1965 को महावीर राउत ने विधान सभा में यह सवाल उठाया कि हायाघाट के नीचे जो लोग बांध के बीच में पड़ गए हैं उनकी हालत खराब हो गयी है और उनके बसने के लिए जमीन नहीं है। बांध बन जाने के कारण जमीन का दाम बढ़ कर 400 रुपये प्रति कट्ठा हो गया है। गरीब हरिजन इतना पैसा दे नहीं सकते। हसनपुर इलाके में 30-40 गाँवों के लोगों को बसाना होगा और सिंचाई विभाग तथा सरकार की यह जिम्मेवारी बनती है कि इन लोगों को जमीन दे। उन्होंने इस सवाल को एक बार फिर विधान सभा में 31 मार्च 1965 के दिन भी उठाया जिसके जवाब में सरकार की तरफ से महेश प्रसाद सिंह ने जरूर यह स्वीकार किया था कि करेह नदी के बांध से उजड़े हुए लोगों का कोई प्रबंध नहीं हो पाया है। यहाँ भूमिहीन लोग तटबंध पर ही रह रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि तृतीय पंचवर्षीय योजना में निधि के अभाव के कारण अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हो पायी है। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में निधि के उपलब्ध होने पर पुनर्वास की कार्यवाही की जायेगी। पुनर्वास के इस आश्वासन का मतलब था कि तटबंध का काम तो पहली पंचवर्षीय योजना में हो जाना था मगर पुनर्वास के लिए उसके बाद कम से कम 10 वर्ष इंतजार करना था। बागमती के निचले हिस्से में पुनर्वास का मसला एक बार फिर 17 फरवरी 1966 को उठा जब महाबीर राउत ने ही वहाँ तटबंधों पर बसे लोगों को सरकार द्वारा हटाये जाने की धमकी दिये जाने का सवाल उठाया। उनका कहना था कि ऐसे लोग बड़ी दयनीय स्थिति में जी रहे हैं और वहाँ से हटाये जाने पर उनकी हालत और बदतर होगी। सरकार की तरफ से जो जवाब दिये गए वे गोल-मटोल थे। ग्राम कुण्डल, सिंघिया प्रखण्ड, जिला समस्तीपुर के गंगेश प्रसाद सिंह बताते हैं, ‘‘...जब यह तटबंध बन रहा था तब हम लोग बच्चे थे और चौथी-पाँचवीं कक्षा में पढ़ते रहे होंगे। पिताजी बताते थे कि सरकार से मुआवजे की अपेक्षा लोगों को थी मगर सरकार का यह कहना था कि प्रभावित लोगों को बॉण्ड दिया जायेगा। बॉण्ड क्या होता है इसका मतलब ही लोगों को नहीं मालुम था। जो समझते भी थे उनको भी बॉण्ड देने में इतना परेशान किया गया कि वे लोग भी थक हार कर बैठ गए और ककड़ी के मोल जमीन हाथ से निकल गयी। पुनर्वास किसी को मिला नहीं और तटबंध और नदी के बीच रहने वाले अधिकांश लोग तटबंध या उसके बगल की जमीन पर ही घर बना कर रह रहे हैं। इनकी संख्या में हर साल वृद्धि होती है क्योंकि जहाँ-जहाँ गांव नदी की धारा से कटते हैं या डूबते हैं, वहाँ-वहाँ के लोग तटबंध पर चले आते हैं।’’ 

कुछ इसी तरह की व्यवस्था के बारे में बताते हैं करांची (प्रखण्ड बिथान, जिला समस्तीपुर) के पूर्व अध्यापक राम सुधारी यादव, जिनका कहना है, ‘‘...पुनर्वास तो एक औपचारिकता थी जिसे जैसे-तैसे पूरा कर दिया गया था। यहाँ तटबंध के किनारे घनी बस्तियाँ हैं। यह जमीन सरकारी है। बरसात में पूरा इलाका डूबता है क्योंकि बांध कहीं न कहीं टूटता ही है-उसका पानी आता है। बारिश का पानी है ही। किसी भी आपात् स्थिति का सामना करने के लिए तटबंध के ऊपर शरण ली जा सकती है। इसलिए लोग बांध के नजदीक रहना पसंद करते हैं। कुछ परिवारों ने बांध के आस-पास जमीन खरीद कर भी घर बना लिये हैं।’’ 

दीमोदर यादवदीमोदर यादवबहुत से गाँवों का पुनर्वास हुआ ही नहीं और ऐसे गाँव अभी भी करेह के तटबंधों के बीच नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। ऐसा ही एक गांव है दरभंगा जिले के हायाघाट प्रखंड का अकराहा जो कि दरभंगा-समस्तीपुर रेल लाइन पर पुल संख्या 17 के पूरब में बसा हुआ है। यहाँ की अविश्वसनीय जीवन शैली के बारे में बताते हैं पचपन वर्षीय दामोदर यादव। वे कहते हैं, ‘‘...पुनर्वास तो कभी नहीं मिला। अगर मिला होता तो चले ही गए होते। हमारा गांव रेल लाइन के पूरब में है। कम से कम तीन महीनें तो पूरा पानी भरा रहता है। उस समय हम गांव छोड़ कर रेल लाइन पर या बांध पर चले जाते हैं। पानी घटता है तब लौटते हैं। बांध पर बाढ़ के समय तो सरकार रहने देती है मगर कहीं टूट-फूट हो जाए तब मरम्मत करने के लिए वहां से भी हटा देती है। हमलोगों की हालत 1987 के बाद से बहुत ज्यादा खराब हो गयी। यहां पास में खरसर के पास एक पंचफुट्टा (पांच फुट ऊँचा) बांध हुआ करता था। पानी ज्यादा बढ़ने पर उसके ऊपर से वह निकल जाया करता था और हमारे यहां पानी कम हो जाता था। 1987 के बाद सरकार द्वारा इसे ऊँचा और मजबूत बना दिया गया और तभी से हमारी बरबादी शुरू हो गयी। अब अगर पास में कहीं टूट जाए तो हमें फायदा होता है। दूर नीचे टूटने पर तो हमें कोई फायदा नहीं होता। जब बांध पर रहते हैं तो नाव से आकर घर-द्वार की हालत देख जाते हैं और फिर वापस बांध पर। तीन-चार महीनें तो बाहरी दुनियाँ से कोई संपर्क रहता ही नहीं है। गांव का प्राइमरी स्कूल भी इस दौरान बंद रहता है। ...एक ही फसल होती है यहां रब्बी की। गेहूँ, मकई के अलावा अब कुछ भी नहीं उपजता। बाहर जमीन है नहीं हमारी। रिलीफ आदि भी कुछ नहीं मिलता, कभी-कभी कोई मेहरबानी कर के कुछ दे गया तो बड़ी बात है। खर्चा-पानी के लिए तो गांव से बाहर निकलना ही पड़ता है। लहेरियासराय में मजदूरी कर लें या दिल्ली चले जायें। सिर्फ गेहूँ और मकई पैदा करके तो जीवन चलने वाला नहीं है। चावल खरीदना ही पड़ता है। रोजमर्रा की चीजों, शादी-ब्याह, जीवन-मरण सब के लिए तो नगद पैसा चाहिये। हमारे गांव के अधिकांश लोग दिल्ली के आस-पास सब्जी उगाने में मजदूरी करते हैं। गांव में कुछ लोगों के पास भैसें हैं-दूध होता है, लहेरियासराय में बेच लेते हैं। बरसात के महीनें में हम चाहे जहाँ भी रहें हमारा गांव से संपर्क बना रहता है। सुनते हैं कि बांध ऊँचा और मजबूत किया जायेगा। अगर ऐसा हुआ तो पानी हमारे घर के ऊपर से बहेगा और तब तो बांध पर ही रहना पड़ेगा क्योंकि हमारी हैसियत नहीं है कि कहीं अपनी जमीन खरीद कर घर बना लें।’’ 

तटबंधों के आस-पास या उनके अंदर जहाँ ऐसी स्थिति है, तटबंधों से दूर भी हालात कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। पुरानी बागमती का वह रास्ता जिससे वह बूढ़ी गंडक से मिलती थी, उसी के बायें किनारे का गाँव है हथौड़ी, मौजे धोबीपुर टोला, जिला दरभंगा-और यहीं कच्ची सड़क के दूसरी तरफ किशनपुर बैकुण्ठ गांव है, प्रखंड वारिस नगर, जिला समस्तीपुर। यह सड़क ही दोनों जिलों की सीमा बनाती है। बाढ़ के समय यहाँ गर्दन भर पानी रहता है। उस समय लोग यहां से उठ कर गांव के चौक के पास जहाँ सड़क ऊँची है, वहां चले जाते हैं अपने जानवरों के साथ। वहां भी पानी बढ़ता है तो चौकी पर ईंटें बिछा कर पहले अनाज बचाते हैं फिर उतनी सी ही जगह में पूरा परिवार रहता है। तब भी अगर पानी बढ़ता है तो वाटरवेज के बांध पर चले जाते हैं। पानी बहुत ज्यादा बढ़ने पर हथौड़ी कोठी के पास करेह नदी के बांध पर जगह मिल जाती है-जो यहां से 2-3 किलोमीटर पड़ता है। कुछ लोग बागमती के बांध पर मधुरापुर चले जाते हैं। तीन महीना इसी तरह यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ बिस्तर हटाने का इंतजाम करते बीत जाता है। अनाज रहता है मगर खाना बनाने का जुगाड़ नहीं बैठता। सारा जीवन नाव, बांस और तैरने पर निर्भर हो जाता है।

लक्ष्मी महतोलक्ष्मी महतोयहां पानी करेह का ही आता है भले ही यह नदी हायाघाट के नीचे बंधी हुई है मगर इसका तटबंध कहीं न कहीं हर साल टूटता ही है। तटबंध टूटा और यहाँ लोगों की हालत खराब हुई। फिर भी बाढ़ के पानी से फायदा होता है कि फसल अच्छी हो जाती है। इधर दो साल से तटबंध नहीं टूटा है तो किसानों को सिंचाई का इंतजाम करना पड़ रहा है। सरकार की कोई व्यवस्था है नहीं। प्राइवेट बोरिंग से 75 रुपया प्रति घंटा पर सिंचाई होती है। 6 कट्ठा मकई की सिंचाई के लिए साढ़े तीन घंटा पानी देना पड़ता है। क्या बचेगा ऐसे में? स्टेट बोरिंग रहती तो इतना खर्चा नहीं पड़ता मगर उसके लिए भी बिजली चाहिये जिसकी न तो कोई निश्चितता है और न समय। दिन में तीन घंटा भी निश्चित समय तक बिजली रहे और सारे दिन न भी रहे फिर भी किसान का काम चलता मगर इतना भी नहीं हो पाता है। धोबीपुर टोला के लक्ष्मी महतो अपनी हालत बड़े दार्शनिक भाव से बताते हैं, ‘‘...मेरे पास जमीन नहीं है। बटइया करते हैं, मेहनत करते हैं, मगर जीते शान से हैं। मनखाप में एक साल में 12 से 15 मन अनाज मालिक को देना पड़ता है, बाकी उपज हमारी। साल में दो फसल होती है, काम चल जाता है। बटइया में आधी-आधी फसल बंटती है। खर्चा हर हालत में बटायीदार का होता है। ...खरसर में बागमती का मुँह खोल देने से तो यहाँ की हालत और भी खराब हो जायेगी। उस हालत में पुरानी बागमती के इस हिस्से पर भी बांध बनाना पड़ेगा। यह बात अलग है कि मिट्टी का बांध है तो टूटेगा ही। जब इस शरीर का ही कोई भरोसा नहीं है तो बांध का क्या भरोसा? देखिये, बांध कभी अपने से नहीं टूटता, तोड़ा जाता है। पब्लिक कुछ भी न करे तो भी बांध की रखवाली तो करती ही है।’’ 

शनिवार, 11 फ़रवरी 2017

Kishanpur Baikunth Is Planning To Launch His Very Own Andriod Application

Preview Image

 Hey ! Everybody
Today We Are Here To Inform You That Kishanpur Baikunth Is Planning To Launch His Very Own Andriod And Apple Application To All Of Our Sweet Village Person.
So Ladies And GentleMan May I Have Your Attention Please.
↯↯

As You All Know That Kishanpur Baikunth Is Being Very Famouse Thease Days On Facebook So We Have Now Tied Up With FindingSaurabh Web Inc And Now We Are Going To Launch Our Andriod Application On Our 2nd Facebook Anniversary And That Is 4th June.


     So All Of You Have To Make Pattence And Stay Tunned With Us Because We Are Making This Very Own Applicaton For You.

शनिवार, 19 नवंबर 2016

गाँव की लड़कियाँ | एक कविता बिहार से

                            Symbolic Image
संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह ‘आवाज भी देह है’ को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया तथा उन्हें जयपुर में दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।  संजय औरंगाबाद  दाउदनगर महाविद्यालय से सेवारत अध्यापक एस के शांडिल्य और अंकोढा मिडिल स्कूल में कर्यरत शिक्षिका मांडवी पांडेय के बडे पुत्र हैं। संजय अपने स्कूली जीवन से ही कविता लिखा करते थे। दाउदनगर के विवेकानंद मिशन स्कूल से शिक्षक के रुप में उन्होंने अपने कैरियर की शुरुवात की और अभी गोपालगंज सैनिक स्कूल में राजनीतिक शास्त्र  शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। बिहारगीत भी उन्होंने ही लिखा था जिसके लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था।  बोधि पुस्तक पर्व के चौथे सेट की दस और दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना के तहत प्रकाशित पांच पुस्तकों का लोकार्पण पिछले सोमवार (दिनांक  ०७ नवम्बर २०१६ ) की शाम पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर के सभागार में हुआ।
कहते हैं की भारत की आत्मा हमारे गॉवों  में बसती है , आज के माहौल में जहाँ नारीवाद का  विष्कृत  रूप दिखने को मिलता है , वहाँ हमे आइना दिखाती हुई संजय कुमारशांडिल्य की एक कविता बिहार से में यह कविता –

मैं कहूँ कि गाँव की लड़कियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लड़कियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक

दबंगों की बेहिस छेड़ को जमाने से ज्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लड़कियाँ
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लड़कियाँ अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फर्क

मैं कहूँ कि गाँव की लड़कियाँ किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लड़कियाँ खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूङी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं खरीदना होता है

गाँव की लड़कियाँ गाँव की लड़कियाँ होती हैं
खूब गहरी 
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जङें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई

इन घनी लड़कियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं

आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?

मन की बात | अमन आकाश

थोरा सा शमय निकाल कर इसको परिए..😃 हाँ ठीक है हम बिहारी हैं.. बचपने से अइसे इस्कूल में पढ़े हैं, जहाँ बदमाशी करने पर माट साब "ठोठरी प...