बुधवार, 23 जनवरी 2019

मन की बात | अमन आकाश

थोरा सा शमय निकाल कर इसको परिए..😃

हाँ ठीक है हम बिहारी हैं.. बचपने से अइसे इस्कूल में पढ़े हैं, जहाँ बदमाशी करने पर माट साब "ठोठरी पकड़ के खिड़की दने बीग देने" का धमकी देते थे.. बचपने से हम हिंदी के नाम पर मैथिलि-मगही का खिचड़ी बोले हैं.. ता का हुआ जो हम शाम को साम बोलते हैं, ता का हुआ जो हम टॉपिक को टापिक बोलते हैं, ता का हुआ जो हम सड़क को सरक बोलते हैं. समझ में आ जाता है ना..? बस हो गया.. भाषा का मतलबे ईहे है कि सामने वाला को अपना बात समझा दो.. दवाई दोकान पर जाते हैं तो का कहते हैं हम.? भईया पेट झड़ने का दवाई दीजिए.. तो ऊ पेट ठीक होने का ही दवा देता है ना जी! बात समझ गया ना कि हम का बोलना चाह रहे थे.. जब नउमा पास एगो दवाई दोकानदार इतना बात समझ जाता है ता आप पढ़ल-लिखल लोग काहे बेमतलब बतकुच्चन करते हैं!!😰

तीन साल दिल्ली रहे.. जभिए मुंह खोलते थे सामने वाला बूझ जाता कि बिहारी है.. जबले बिहारी म्यूट, तबले बिहारी क्यूट.. दिल्ली वाला दोस्त सब हंस देता था.. अबे झगरा नहीं होता है, झगड़ा होता है भाई.. गज़ब चौपट आदमी हो महराज, इधर हमको सोंटाई पड़ने वाला है आ तुमको अइसा क्रूशियल टाइम में हमारा परननसिएशन सुधरवाना है.. बहुत कोशिश किए कि साम को शाम बोले, इस चक्कर में सुंदर भी शुन्दर निकल जाता था.. बहुत कोशिश किए सरक को सड़क बोलें, इस चक्कर में आरा-बक्सर को भी आड़ा-बक्सड़ कर देते थे! बहुत हुज्जत हुआ.. लेकिन दिल्ली छोड़ते-छोड़ते भाषा ठीक हो गया.. अब हिंदी बोलते है ता सामने वाला कहता है बुझैबे नहीं करता है आप बिहारी हैं! इसलिए हम इस भाषा में लिखते हैं कि हमारा बिहारी वाला पहचान बचा रहे..!!👳

हाँ, ता शुद्ध हिंदी सीखते-बोलते जीवन का तेइस बसंत बीत गया.. ता अब सोसाइटी कहता है हिंदी वाला नहीं चलेगा.. वी वांट फ़्लूएंट इंग्लिश.. आ अंग्रेजी में भी साला दू अलग-अलग क्लास है.. इंटरप्रेनुएर वाला मिडिल क्लास आ आंत्रप्रेन्यर वाला एलिट क्लास.. अरी दादा, सरक से सड़क पर आने में तेइस साल लग गया.. अब हम कहाँ से इतना जल्दी शशि थरूर बन जाएं.. अभी तो चार साल पहले तक दोकान के बाहर टंगाए SALE-SALE-SALE को साले-साले-साले पढ़ते थे..! अब हमको ईहो डर लगने लगा है कि तीस साल तक होते-होते रो-धो के अंग्रेजी सीख भी जाएं ता कहीं सोसाइटी फिर ना कहीं बोले - "ब्रो, इंग्लिश इज आउटडेटेड.. अब जावा, c++ आ पायथन चलता है!"😀

- Aman Aakash..🖋©

गुरुवार, 1 मार्च 2018

Holi 2018: आगे आने वाले समय के लिए होली देती है ऐसे संकेतSource




Source ~Google Image
रंगों का त्योहार होली फाल्गुन मास की पूर्णिमा के एक दिन बाद मनाया जाता है। पूर्णिमा के दिन होलिका दहन किया जाता है। होलिका दहन को लेकर अलग-अलग जगह कई मान्यताएं हैं। शास्त्रों की मानें तो भक्त प्रह्लाद और होलिका की कहानी से इसे जोड़कर देखा जाता है। लेकिन इसके अलावा भी लोगों में होलिका दहन से जुड़ी और भी मान्यताएं हैं। इन मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन का धुआं भी हमें कई संकेत देता है। यहां हम आपको बता रहे हैं होलिका दहन के समय से जुड़ी मान्यताएं।
होलिका दहन के समय कहा जाता है कि इसका धुआं जिस दिशा में जाता है उससे राज्य, राजा और प्रजा के बारे में कई तरह के भविष्य के बारे में जानकारी मिलती है। ऐसा धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कहा गया है। ऐसी मान्यता है कि होलिका दहन के समय अगर धुआं सीधा आकाश में जाता है तो इससे राजा के बदलने यानी सत्ता पर्विर्तन और राजा पर किसी तरह के संकट की और इशारा करती है।

इसके अलावा अगर होलिका दहन का धुआं  दक्षिण दिशा की ओर जाता है तो यह राज्य के लिए आने वाले किसी खतरे की तरफ इशारा करता है।  अगर होलिका दहन का धुआं पूर्व दिशा की ओर जाता है तो कहा जाता है कि इससे राज्य में सुख संपन्नता आती है। अगर होलिका दहन का धुआं उत्तर दिशा की तरफ जाता है तो राज्य में धनधान्य की कमी नहीं होती।
इस आलेख में दी गई जानकारियां धार्मिक आस्थाओं और लौकिक मान्यताओं पर आधारित हैंजिसे मात्र सामान्य जनरुचि को ध्यान में रखकर प्रस्तुत किया गया है।

बुधवार, 7 फ़रवरी 2018

मांझी द माउंटेन मैन: बिहारी मोहब्बत की एक अनोखी कहानी!


  • मांझी द माउंटेन मैन: बिहारी मोहब्बत की एक अनोखी कहानी!

ए फगुनिया हम तोरा से बहूते प्यार करत है रे .. नवाजुद्दीन सिद्दिकी की दमदार आवाज में बोला गया यह डायलॉग सीधे हमें याद दिलाता है ‘मांझी द माउंटेन मैन’ फिल्म की!
देखने में तो सिनेमा हॉल की एक सीट पर यह फिल्म काफी शानदार लगती है। मगर यह फिल्म बसी है बिहार के उसी गहलौर पर्वत में आज भी,  जो रास्ता गहलौर पर्वत का सीना चीरकर बाहर निकलता है। वह आज भी बिहार के दशरथ मांझी की बिहारी मोहब्बत की कहानी सुनाता है। वो दशरथ मांझी एक बिहारी ही था जिसके हाथों में इतनी ताकत थी कि उसने अपने सामने पर्वत को झुका दिया!
दशरथ मांझी को माउंटेन मैन के नाम से भी जाना जाता है।
1934 में जन्में दशरथ मांझी का जन्म बिहार के छोटे से गांव गहलौर में हुआ था। उस वक़्त गांव बहुत दयनीय परिस्थिति से गुजर रहा था। ना सड़कें, ना पानी, ना बिजली ..मूल भूत सुविधाओं से दूर दूर तक कोई रिश्ता नहीं था गांव का! इसी छोटे से गांव से एक बिहारी के प्यार की कहानी शुरू हुई थी।
गांव पूरी तरह से जात-पात लिपटा हुआ था। मांझी गहलौर के एक गरीब मजदूर के बेटे थे। थोड़े बड़े होने पर वो घर छोड़कर भाग जाते हैं। और फिर कई सालों बाद लौटते है। लौटने के बाद उनकी शादी कर दी जाती है। शादी के बाद गहलौर पर्वत से गिरने से उनकी गर्भवती पत्नी की मृत्यु हो जाती है। उनकी पत्नी का इस तरह से पहाड़ से गिरकर मर जाना उन्हें अंदर तक हिला कर रख देता है। दशरथ मांझी जैसे अपनी पत्नी की याद में पागल हो जाते हैं।
यही आग उनके मन में सिर्फ एक हथौड़े और एक छेनी की मदद से 360 फुट लंबे,30 फुट चौड़े और 25 फुट ऊंचे पहाड़ को काट कर सड़क बना देने की हिम्मत भरती है। इस काम को पूरा करने में मांझी को पूरे 22 साल लग गए। जिसके अद्भुत और सराहनीय कार्य के बाद दशरथ मांझी माउटेन मैन बन गए ।
मांझी का यह सफर काफी लंबा संघर्षपूर्ण रहा। पहाड़ को तोड़ता देखकर पूरे गांव वाले मांझी को पागल समझते थे। सब उन्हें ऐसा पागलपन नहीं करने की सलाह देते थे। कोई उनकी मदद को तैयार नहीं था क्योंंकि सभी को यह काम पागलपन लग रहा था।
हालांकि सफल होने के बाद मांझी का कहना था कि इसी पागल शब्द से उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती थी। उन्होंने संकल्प लिया था कि खुद के दम पर वो अतरी और वजीरगंज के दूरी को कम करेंगे।

22 साल के लगातार परिश्रम के बाद आखिरकर वो पहाड़ काटने में सफल रहे। इस काम में मांझी को 1960 से 1982 तक का समय लगा। मगर उनकी इस सफलता के बाद सड़क बनकर तैयार हुई और पूरे गांव के आवा गमन काफी सरल हो गया।अंत में गांव वाले भी उनकी मेहनत को रंग लाता देखकर उनकी मदद करने लगे थे और साथ ही सराहना भी। मांझी की इज्जत इस सड़क के बनने के बाद दोगुनी हो गई थी। मांझी की मृत्यु 17 अगस्त 2017 को हुई थी।
दशरथ मांझी की इस उपलब्धि के लिए बिहार सरकार ने सामाजिक सेवा के क्षेत्र में 2006 में पद्म श्री के लिए उनका नाम प्रस्तावित किया था। नीतीश कुमार ने उनके नाम पर अस्पताल बनाने की घोषणा भी की है।
दशरथ मांझी पर फिल्म के आलावा एक डॉक्यूमेंटरी फिल्म (द मैन हू मूव्ड द माउंटेन)भी बनी थी। यह डॉक्यूमेंटरी 2012 में बनी थी जिसके निर्देशक कुमुद रंजन हैं। इसी साल मांझी द माउंटेन मैन बनाने की केतन मेहता ने घोषणा की थी। सत्मेव जयते सीज़न 2 के पहले एपिसोड में भी दशरथ मांझी की कहानी दिखाई गई थी।
एक बिहारी के अंदर का जज्बा बेमिसाल ताकत और अनोखी मोहब्बत ही बिहार की अलग परिभाषा लिखती है। मांझी के इस योगदान को पूरा बिहार हमेशा याद 

शुक्रवार, 17 नवंबर 2017

सौरभ का ब्लॉग: राजपूतों की वीर गाथा

राजपूत...
पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ, पद्मावती फ़िल्म की आड़ में राजपूत राजाओं पर प्रश्न खड़ा करने और उन्हें कायर कहने वाले बुद्धिजीवी कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। अद्भुत अद्भुत प्रश्न गढ़े जा रहे हैं। राजपूत वीर थे तो हार क्यों जाते थे? राणा रतन सिंह योद्धा थे तो उनकी पत्नी को आग लगा कर क्यों जलना पड़ गया? स्वघोषित इतिहासकार यहां तक कह रहे हैं कि सल्तनत काल के राजपूत शासक इतने अकर्मण्य और कायर थे कि मुश्लिमों का प्रतिरोध तक नहीं कर सके।
सोचता हूँ, क्या यह देश सचमुच इतना कृतघ्न है कि राजपूतों को कायर कह दे? सन 726 ई. से 1857 ई. तक सैकड़ों नहीं हजारो बार, सामने हार देखने के बाद भी लाखों की संख्या में मैदान में उतर कर शीश चढ़ाने वाले राजपूतों पर यदि हम प्रश्न खड़ा करें, तो हमें स्वयं सोचना होगा कि हम कितने नीचे गिर चुके हैं।
आप कहते हैं वे हारे क्यों?

श्रीमान, शिकारी और शेर के युद्ध मे शिकारी लगातार जीतता रहा है, तो क्या इससे शेर कायर सिद्ध हो गया? नहीं श्रीमान! शेर योद्धा होता है, और शिकारी क्रूर। राजपूत योद्धा थे, और अरबी आक्रमणकारी क्रूर पशु। राजपूतों के अंदर मनुष्यता थी, तुर्कों के अंदर रक्त पीने ही हवस। वहशी कुत्ते तो बड़े बड़े बैलों को काट लेते हैं, तो क्या बैल शक्तिहीन सिद्ध हो गए? और यदि सच मे आपको लगता है कि तुर्कों, अरबों के सामने राजपूत बिल्कुल भी प्रभावी नहीं रहे, तो आप दुनिया की अन्य प्राचीन सभ्यताओं की ओर निगाह फेरिये, और खोजिए कि मिस्र के फराओ के वंसज कहाँ हैं? ढूंढिए कि मेसोपोटामिया की सभ्यता क्या हुई। पता लगाइए कि ईरान के सूर्यपूजक आर्य अब क्या कर रहे हैं। श्रीमान! इस्लाम का झंडा ले कर अरब और तुर्क जहां भी गए, वहां की सभ्यता को चबा गए। वो राजपूत ही थे, जिनके कारण भारत बचा हुआ है। उन्होंने अपने सरों से तौल कर इस मिट्टी को सींचा नहीं होता, तो आप अपने घर मे बैठ कर बुद्धिजीविता नहीं बघारते, बल्कि दाढ़ी बढ़ा कर यह तय कर रहे होते कि शौहर का अपनी बीवी को कितने कोड़े मारना जायज है।
आज एक अदना सा पाकिस्तान जब आपके सैनिकों का सर काटता है, तो आप बौखला कर घर मे बैठे बैठे उसको गाली देते और अपनी सरकार को कोसते रह जाते हैं। तनिक सोचिये तो, भारतीय राजाओं से मजबूत सैन्य उपकरण(बारूद और तोप वही ले कर आये थे), अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और तेज घोड़े, और ध्वस्त कर देने का इरादा ले कर आने वालों के सामने वे सैकड़ों बार गए और शीश कटने तक लड़ते रहे, इसके बाद भी जब आप उनपर प्रश्न खड़ा करें तो क्या साबित होते हैं आप?

आपको जौहर अतार्किक लगता है तो यह आपकी दिक्कत है भाईजान, पर अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए आग में जल जाने वाली देवियों के ऊपर प्रश्न खड़ा करने की सामर्थ्य नहीं आपकी, आप तो 40 डिग्री तापमान पर ही बिजली के लिए सरकार को गाली देने वाले लोग हैं। भाई जान, जलती आग में कूद जाने के लिए मर्द का नहीं, स्त्री का कलेजा चाहिए, और हार दिखा रहे युद्ध में भी कूद कर शीश कटा लेने के लिए राजपूत का कलेजा।
दूसरों की छोड़िये, जिन चंद राजपूत राजाओं को हम और आप मुगलों का समर्थन करने के कारण गाली देते और गद्दार कहते हैं, उनके पुरुखों ने भी बीसों बार इस राष्ट्र के लिए सर कटाया था। आज भी किसी राजपूत लड़के के खानदान का पता कीजिये, मात्र तीन से चार पीढ़ी पहले ही उसके घर में कोई न कोई बलिदानी मिल जाएगा।
घर मे बैठ कर तो किसी पर भी उंगली उठाई जा सकती है बन्धु, पर राजपूत होना इस दुनिया का सबसे कठिन काम है।
कलेजे के खून से आसमान का अभिषेक करने का नाम है राजपूत होना। तोप के गोले को अपनी छाती से रोकने के साहस का नाम है राजपूत।
आप जिस स्थान पर रहते हैं न, पता कीजियेगा उस जगह के लिए भी सौ पचास राजपूतों ने अपना शीश कटाया होगा।
छोड़ दो डार्लिंग, तुमसे न हो पायेगा।

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

सौरभ का ब्लॉग : पद्मावती का इतिहास और फिल्म


नया फिल्म आने वाला है संजय लीला भंसाली का पद्मावती  इस मूवी ने पुरे मार्किट आग लगा रखा है।
जैंसा की हम सब  भंसाली तो  शुरू से ही  के साथ छेड़छाड़ करता आया लेकिन इस  बार तो हद ही पार कर दी इस भंसाली कहानी और तथ्य पर गया है  शरासर गलत  है
सोर्स : विकिपीडिआ 
ये कहानी  की और चलिए अब लेते है एक्सपर्ट्स  की राय और इतिहासकारो का मत
इतिहास करो का ये मानना है की -
 इस विषय पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास के प्रोफेसर नजफ हैदर कहते हैं कि उनका शोध 14वीं और 16वीं शताब्दी पर है, इसलिए वो भरोसे के साथ कह सकते हैं कि पद्मावती एक काल्पनिक किरदार हैं। यहां तक कि अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर हमले की बात तो करता है, लेकिन पद्मावती का कोई जिक्र नहीं है। उस  समय की कोई भी किताब उठा लें, उसमें कहीं भी जिक्र नहीं मिलता है। पद्मावती के लोकप्रिय होने की वजह यह है कि स्थानीय राजपूत पंरपरा के तहत चारणों ने इस किरदार का खूब बखान किया। इस वजह से भी यह कथा काफी लोकप्रिय हुई। यह सच है कि 16वीं शताब्दी में हिन्दी साहित्य पद्मावत में मलिक मुहम्मद जायसी ने इस किरदार को जिंदा किया। हिन्दी साहित्य में पद्मावती की जगह है और साहित्य भी इतिहास का एक हिस्सा होता है। हिन्दी साहित्य को पढ़ाने के लिए पद्मावती का विशेष रूप से इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन इतिहास की किताब में पद्मावती की कोई जगह नहीं है। यदि इतिहास की किताब में पद्मावती है तो यह भ्रमित करने वाला है।

थोड़ी देर के लिए ये  उटपटांग लगे फिर भी मानने लायक है लेकिन क्या आप जानते है की मलिक मुह्हमद जायसी ने पद्मावत रचंना १६वी सदी में की थी और रतन सिंह  सदी में राजस्थान पर राज किया करते थे अतः ये बाते आधी हक़ीक़त आधा फ़साना है लेकिन फिर भी अगर इस से भावनाये आहत होतृ है  मानना है की इस  अविलमब बैन कर देना चाहिए और  केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड  को इतिहासकारो की एक कमिटी बना कर ऐसे फिल्मो को रोकना  चाहिए जो गलत इतिहास। 

शनिवार, 21 अक्टूबर 2017

इस बार छठ छूट न पाए | अपनी परंपरा बचाये रखने की सीख देता ये वीडियो “कबहू ना छूटी छठ”

दिवाली की रात के बाद की ही सुबह से हवाओं में हल्की ठण्ड के साथ छठ की आहट आने लगती है। चारो ओर की चहल पहल इस महापर्व के नज़दीक आने का इशारा करने लगती है। लोगों में तो उत्साह और हर्षोल्लास की लहर होती ही है इसके साथ साथ मौसम भी एक सुहानी अंगड़ाई ले कर मानो छठ का स्वागत कर रहा होता है। ऐसे ही माहौल को और छठमय बनाने नितिन चंद्रा और उनकी निओ बिहार की टीम पिछले साल के जैसे इस बार भी छठ के उपलक्ष्य में छठ का एक नया वीडियो ले के आये हैं।
“कबहू ना छूटी छठ”, ये नाम है इस गाने का। क्रांति प्रकाश झा और क्रिस्टीन ज़ेडएक ने इस बार भी अपने अभिनय से मन मोह लिया है। इस गाने में चार चाँद लगाया है हिंदी और भोजपुरी संगीत की दो महान आवाज़ें अल्का याग्निक और भरत शर्मा व्यास ने। छठ के कालजयी गानों की लड़ी में इस गाने ने एक और कड़ी जोड़ दी है।
इस गाने में बात की गयी है हमारी इस परंपरा को ख़त्म न होने देने की। आज के दौर में जहाँ लोगों की प्राथमिकतायें कृत्रिम और अपनी जड़ों से दूर करने वाली चीज़ों की तरफ मुड़ गयी है वहाँ ज़रूरत है कि अपनी मिट्टी की ख़ुश्बू देने वाली इस विरासत को हम सहेज के रखें। वो बात जो इस त्यौहार को इतना ख़ास बनाता है वो ये है कि इसमें अमीरी-गरीबी, जाति-धर्म, पुरुष- महिला का भेद नहीं होता है। बिहार और हमारे पुरे देश को इस से बेहतर सन्देश देने वाला दूसरा त्यौहार शायद ही कोई हो। ये एक तरह से बुनियाद है हमारे व्यक्तिगत आदर्शों और उस आदर्श समाज की जिसकी हम कामना करते हैं। इन सब को ध्यान में रखते हुए ये सुनिश्चित करना ज़रूरी हो जाता है कि वक़्त के साथ आगे बढ़ने की होड़ में छठ पीछे ना छूट जाये।

तो हम सबको ये ध्यान रखना होगा कि हम अपनी इस विरासत को अपनी ज़िन्दगी में अहमियत दें। जो घर से दूर हैं उनको ये छठ घर बुलाती है। और अगर घर न भी आ पाएं तो जहाँ भी हों इस छठ की भावना को दिल में बचाये रखें।

लेख साभार - PatnaBeats
वीडियो साभार - NeoBihar

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

पलट तेरा ध्यान किधर है : नया पोस्ट इधर है



पलट तेरा ध्यान किधर है यूट्यूब पर एक चैनल आजकल धमाल मचा रहा है जिसके एंकर है हमारे अपने,हमारे बीच,हमारे भाई साहिल चंदेल यूट्यूब की दुनिया में साहिल चंदेल या पलट तेरा ध्यान किधर है कोई ज्यादा पुराना नाम नहीं है बस कुछ दिन पहले आया और लोगो के दिल पर राज करने लगे लगा आज इनके चैनल पर 1 लाख सब्सक्राइबर पूरे हो गए है तो हम लेकर आए है उनसे ही बातचीत का एक छोटा सा अंश वैसे वास्तव म य छोटा सा अंश नहीं बल्कि छोटी सी बातचीत का बड़ा सा सारांश है क्योंकि आजकल इंडिया में यही चल रहा है छोटी बातो को बड़ा मुद्दा बनाया जाता है।
साहिल से मैंने खुद बात की है लेकिन फेसबुक के माध्यम से सच पूछो तो मै इसे आज तक व्यक्तिगत रूप से मिलवनही पाया लेकिन मिलने का समय जरूर मांग लिया है। अब बात करते है साहिल और इनके चैनल के बारे में साहिल एक मध्यमवर्गीय परिवार से नाता रखते है हो बिहार के समस्तीपुर के एक छोटे से कस्बे वारिसनगर के पास किशनपुर बैकुंठ है और खुशी की बात ये है कि ये हमारा कस्बा है जो कि अपने आप में खुशहाल है। अब बात करते है साहिल और साहिल के कारनामो कि हमारी बात्चीत के आधार पर -

 प्रश्न - तो सबसे पहले हम ये जानना चाहेंगे कि आपने पलट तेरा ध्यान किधर है कि शुरुआत कैसे की?
 उत्तर - कुछ खास नही बस इडिटिन्ग और निर्देशन कि दुनिया मे कुछ खास करने के लिये मैंने इस चैनल की शुरुआत की थी और आज हम अपने सभी सब्सक्राइबर के साथ के बूते ही आज यहाँ हूँ।इन बातों के लिए मैं अपने सभी सब्सक्राइबर को धन्यवाद कहना चाहूंगा।
 प्रश्न - क्या आपने फ़िल्म निर्देशन या एदितिन्ग के क्षेत्र मे शिक्षा प्राप्त कि है?
 उत्तर - नहीं,नहीं यूटुब ही मेरा शिक्षन संस्थान है और मैने यही से डिग्री ली है,यहां मैने काफी लोगो से बहुत कुछ सिखा है।
 प्रश्न - आप ने अपना पहला वीडियो कैसे शूट किया था?
 उत्तर - मैं उस समय गुड़गाव(अब गुरुग्राम) स्थित क्म्पनी मे काम कर रहा था,सुबह के 2 बज रहा था और हमारा सिस्टम काम नहीं कर रहा था उसी समय मैंने अपने दोस्तों को साथ पहली बार शूट किया था,फिर मेरे एक दोस्तो ने मुझे यूट्यूब पर वीडियो अपलोड करने के लिए ।
 वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करे प्रश्न - आप अपना आदर्श किसे मानते है? उत्तर - वैसे तो किसी को भी नही लेकिन मैने भुवन बम(BB Ki Vines) से बहुत कुछ सीखा है,और अकेले ही चल पड़ा हूँ ,जिसमे मेरे साथ लोग जुड़ते गए और आज मैं यहाँ हूँ,ये मेरे साथियो की बदौलत है।

प्रश्न - आपके चंद पसन्दीदा यूटुब चैनल?
उत्तर - वैसे तो मुझे यूट्यूब के लगभग सभी चैनल पसंद करता हूँ लेकिन मेरे कुछ पसंदीदा चैनल है - Film Riot,Sam And Niko,Surface Studio और भी है

प्रश्न - तो अभी आप क्या कर रहे है?

उत्तर - मेरा अपना ओफ़िस है जहां मैं एदितिन्ग का काम करता हूं,मैने दो फुल फ़िल्म भी एडिट किये है जो कि प्यार बनाम खाप पंचायत और कसम हमार माई के है
भाई ने दो फ़िल्म भी एडिट की है जो अभी रिलिज नही और भैया का कहना है कि वो करो जिससे तुम्हे प्यार है,बद्ले मे तुम्हे भी प्यार मिलेगा

सोमवार, 9 अक्टूबर 2017

खुशखबरी: इस कारण गिनीज बुक में दर्ज होने जा रहा है बिहार का मधुबनी रेलवे स्टेशन का नाम


दुनियाभर में बिहार का मधुबनी अपने अनोखे मधुबनी पेंटिंग के लिए प्रसिद्ध है| एक बार फिर मधुबनी अपने इस गौरवपूर्ण विरासत के लिए विश्व फलक पर चमकने के लिए तैयार है| जी हाँ, पूर्व मध्य रेलवे के मधुबनी स्टेशन का नाम जल्द ही गिनीज बुक में दर्ज हो सकता है। इसके लिए यहां दीवारों पर करीब 8000 से अधिक वर्ग फुट में मिथिला पेंटिंग उकेरी जा रही है। किसी भी लोक चित्रकला क्षेत्र में इतने बड़े एरिया में पूरे वर्ल्ड में एक रिकॉर्ड हो सकता है। मधुबनी का रेलवे स्टेशन आपको न केवल मधुबनी पेंटिंग के लिए आकर्षित करेगा, बल्कि इन पेंटिंग के जरिए आप इस क्षेत्र की पुरानी कहानियों और स्थानीय सामाजिक सरोकारों से भी रूबरू हो सकेंगे। मधुबनी रेलवे स्टेशन की दीवारों पर गैर सरकारी संस्था ‘क्राफ्टवाला’ की पहल पर करीब 7,000 वर्गफीट से अधिक क्षेत्रफल में मधुबनी पेंटिंग बनाई जा रही है। इसमें 100 कलाकार अपना श्रमदान कर रहे हैं। इस कार्य में रेलवे भी सहयोग कर रहा है। संस्था के संयोजक और मधुबनी के ठाढ़ी गांव निवासी राकेश कुमार झा ने बताया कि किसी भी क्षेत्र में इतने बड़े क्षेत्रफल में लोक चित्रकला को उकेरा जाना एक रिकॉर्ड हो सकता है। झा ने बताया कि गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में मात्र 4566.1 वर्गफीट में पेंटिंग दर्ज है, जबकि भारत में सबसे बड़ी पेंटिंग का रिकॉर्ड मात्र 720 वर्गफीट का है। तकरीबन आठ हजार वर्ग फुट में कलाकृतियां बनाए जाने का लक्ष्य यहां रेलवे स्टेशन को पूरी तरह मधुबनी पेंटिंग्स से संवरने के बाद इसके विश्व का सबसे बड़ा मधुबनी पेंटिंग्स से सुसज्जित क्षेत्र होने का अनुमान लगया जा रहा है। डीआरएम ने बताया कि प्लेटफार्म सहित स्टेशन परिसर के लगभग आधा किलोमीटर के रेडियस में तकरीबन आठ हजार वर्ग फुट में विभिन्न विषयें पर कलाकृतियां बनाए जाने का लक्ष्य है। इस पेंटिंग को बनाने में करीब 100 से ज्यादा कलाकार जुटे हुए हैं। डीआरएम की मदद से बन रही इस पेंटिंग के लिए कलाकार पूरे जी जान से जुटे हुए हैं। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि इतना बड़ी योजना श्रम दान से चलाई जा रही हैं। अगले दो दिनों में ये पेंटिंग पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। सात दिनों तक चलने वाले इस पेंटिंग अभियान में पारिश्रमिक के तौर पर कलाकारों को कुछ नहीं मिलेगा। फिर भी पूरे लगन से कलाकार भारत के सबसे गंदे स्टेशन को खूबसूरत बनने में जुटे हुए हैं।

गुरुवार, 28 सितंबर 2017

चमत्कार है इस माटी में इस माटी का तिलक लगाओ | एक कविता बिहार से

बाबा नागार्जुन हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। बाबा नागार्जुन बचपन से ही घुमक्कड़ प्रवृति के कारण “यात्री” हो गए।

बाबा नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है।
नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं।जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं।
भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है।

प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन की एक कविता, जिसका शीर्षक है- ‘भोजपुर’|

 

1:
यहीं धुआँ मैं ढूँढ़ रहा था
यही आग मैं खोज रहा था
यही गंध थी मुझे चाहिए
बारूदी छर्रें की खुशबू!
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ…
बारूदी छर्रें की खुशबू!
भोजपुरी माटी सोंधी हैं,
इसका यह अद्भुत सोंधापन!
लहरा उठ्ठी
कदम–कदम पर, इस माटी पर
महामुक्ति की अग्नि–गंध
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ
अपना जनम सकारथ कर लूँ!

2

मुन्ना, मुझको
पटना–दिल्ली मत जाने दो
भूमिपुत्र के संग्रामी तेवर लिखने दो
पुलिस दमन का स्वाद मुझे भी तो चखने दो
मुन्ना, मुझे पास आने दो
पटना–दिल्ली मत जाने दो

3

यहाँ अहिंसा की समाधि है
यहाँ कब्र है पार्लमेंट की
भगतसिंह ने नया–नया अवतार लिया है
अरे यहीं पर
अरे यहीं पर
जन्म ले रहे
आजाद चन्द्रशेखर भैया भी
यहीं कहीं वैकुंठ शुक्ल हैं
यहीं कहीं बाधा जतीन हैं
यहां अहिंसा की समाधि है…

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एक–एक सिर सूँघ चुका हूँ
एक–एक दिल छूकर देखा
इन सबमें तो वही आग है, ऊर्जा वो ही…
चमत्कार है इस माटी में
इस माटी का तिलक लगाओ
बुद्धू इसकी करो वंदना
यही अमृत है¸ यही चंदना
बुद्धू इसकी करो वंदना

यही तुम्हारी वाणी का कल्याण करेगी
यही मृत्तिका जन–कवि में अब प्राण भरेगी
चमत्कार है इस माटी में…
आओ, आओ, आओ, आओ!
तुम भी आओ, तुम भी आओ
देखो, जनकवि, भाग न जाओ
तुम्हें कसम है इस माटी की
इस माटी की/ इस माटी की/ इस माटी की

बुधवार, 27 सितंबर 2017

मिलिए मिथिला,मिथिलावासी और मिथिला की धरोहर से : मिथिला के विरासत

नई श्रृंखला शुरू कर रहे है शायद हमारे श्रृंखलाओं की पहले कड़ी है मिथिला की विरासत को दर्शाने के लिए नई शुरुआत

बिहार के दरभंगा जिले में काली रूप में मां श्यामा बड़े ही भव्य रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह मंदिर ने केवल चिता पर बना है, बल्कि मंदिर के अंदर हर तरह के मागंलिक कार्य भी किए जाते हैं.
बिहार के दरभंगा जिले में मां काली का यह भव्य मंदिर मौजूद है, जिन्हें यहां भक्त श्यामा माई के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर के निर्माण की कहानी जिसे सुनकर सब हैरान हो जाते हैं. मां काली का यह मंदिर दरभंगा राज परिवार के महान साधक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. इस मंदिर के अंदर दक्षिण दिशा की ओर एक खास स्थान पर आज भी लोग साधक महाराज रामेश्वर सिंह के चिता की तपिस को महसूस करते हैं, फिर चाहे कड़ाके की ठंड ही क्यों न पड़ रही हो.

यहां के लोगों का मानना है कि पूरे भारत में काली की इतनी बड़ी मूर्ति कहीं नहीं है. मूर्ति का विग्रह अलौकिक और अविस्मरणीय है. भक्तों को मां श्यामा के दर्शन से ही अदभुत सुख की प्राप्ति होती है. कहते है अगर भक्त नम आंखो से कुछ मांगते हैं तो उनकी इच्छा अवश्य पूरी होती है. इस विशालकाय मंदिर की स्थापना 1933 में दरभंगा महाराजा कामेश्वर सिंह ने की थी, जिसमें मां श्यामा की विशाल मूर्ति भगवन शिव की जांघ एवं वक्षस्थल पर अवस्थित है. मां काली की दाहिनी तरफ महाकाल और बायीं ओर भगवान गणेश और बटुक की प्रतिमाएं स्थापित हैं. चार हाथों से सुशोभित मां काली की इस भव्य प्रतिमा में मां के बायीं ओर के एक हाथ में खड्ग, दूसरे में मुंड तो वहीं दाहिनी ओर के दोनों हाथों से अपने पुत्रों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में विराजमान हैं.

मां श्‍यामा के दरबार में होने वाली आरती का विशेष महत्व है. माना जाता है कि जो भी मां की इस आरती का गवाह बन गया उसके जीवन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं, साथ ही भक्तों की समस्त मनोकामना भी पूरी हो जाती है. मंदिर के गर्भगृह में जहां एक तरफ काली रूप में मां श्यामा के भव्य दर्शन होते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रार्थना स्थल के मंडप में सूर्य, चंद्रमा ग्रह, नक्षत्रों सहित कई तान्त्रिक यंत्र मंदिर की दीवारों पर देखने को मिलते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस मंदिर में मां श्यामा की पूजा तांत्रिक और वैदिक दोनों ही रूपों में की जाती है.

आमतौर पर हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार यह परंपरा रही है की किसी भी व्यक्ति का कोइ भी मांगलिक संस्कार होने के एक साल तक वह श्‍मशान नहीं जाता है, लेकिन मां श्यामा के इस मंदिर में नए जोड़े मां का आशीर्वाद ही लेने नहीं बल्कि श्मसान भूमि पर बने इस मंदिर अनेकों शादियां भी होती है.

जय मिथिला,जय मैथिल

गांव,गांव के लोग और गांव का इंटरनेट

गांव का ब्लॉग है यहां गांव और गांव से जुड़ी वो बाते होती है जिनसे हम और आप खुद को जोड़ते है।
गांव का नाम सुनकर लोगो के में में ये तस्वीर उभरती है कि कैसे गांव में लोग गंदगी में रहते है, जानवरों के पास सोते है लेकिन बीते कुछ सालों में सचमुच गांव का रहन–सहन बदला,गांव की तस्वीर बदली है और तो और गांव के लोगो को भी बदलते देखा है हमने।
पहले गांव में बिजली नहीं थी शाम को दुकानों पर युवाओं का हुजूम उमड़ता था,राजनीति पर संसद बैठता था लोग अपना राय रखते थे और खूब मजा आता था जोकि व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी पसंद था और मेरा मानना है कि आज मै जो भी चुतियपा कर रहा हूं उसी की देन है लेकिन अब लोगो मै वो उत्साह नहीं रहा हर कोई टीवी और बीवी में व्यस्त है।
उस समय की बात याद आती है जब भी हम कभी घर से बाहर निकलते थे हमे कोई ना कोई साथी मिलता था जिसके साथ हम गप्पे मार सकते थे, बक्चोदी कर सकते लेकिन अब वो दोस्त कहीं खो गए है,अब गांव में वो मजा नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था और इन बातो से मै ये समझता हूं कि सचमुच मेरा देश बदल रहा है लेकिन  बदलाव से मै खुश नहीं हूं,इसमें मुझे वो भारत नहीं दिखता हो मैंने कभी देखा था और आज भी मन में खयाल आता है बचपन के दिन भले थे कितने

अब गांव में हर कोई इंटरनेट का प्रयोग करता है लेकिन उस इंटरनेट से बस पोर्न और यूट्यूब का ट्रेडिंग चूतियापा ही देखता है

सोमवार, 25 सितंबर 2017

छठ की तैयारी

छठ मतलब बिहार का सबसे बड़ा पर्व,वो पर्व जिसके लिए लोग सबसे ज्यादा बेताब होते थे,वो पर्व जिसमें हम सब एक जगह होते थे लेकिन उस पर्व के प्रति लोगों में अब वो उत्साह नहीं रहा जैसा लोगो मै पहले हुआ करता था अब तो हर कोई अपने दरवाजे पर ही छठ माना लेता है  ।

उसी छठ के बारे में आज यू ही लिखने का मन कर गया नेट भी काफी अच्छा चल रहा है आज,तो सुनाते है असली छठ की कहानी जिसे हमने जिया है।

छठ में लोग छठ घाट पर छठ से 15 दिन पहले से आना शुरू कर देते है मेरा घर बिल्कुल घाट के पास है वो भी बाबा बैकुंठ नाथ की गोद में है से बचपन से देखता आया हूं कैसे लोग 15 दिन पहले से ही घाट छेकना शुरू कर देते थे लेकिन पिछले तीन चार साल से कोई नहीं आता बस 2 दिन पहले 2 मजदूर लगा कर पूरा साफ़ करवा देते है और फिर 2 टाइम लोग आ कर सूर्य को अर्घ्य देते है और फिर किसको क्या मतलब की घाट पर क्या होता,मै खुद अपनी बात बताता हूं जब मै 8–9 साल का रहा होऊंगा उस टाइम मै और मेरे दोस्त जब सभी घाट से चले जाते थे तब
मोमबत्ती और दीपक चुना करता था और फिर उससे हम खेलते थे लेकिन अब बच्चे हाइजीन ही गए है वो गंदे चीजों को नहीं छूते चुकी वो कूल्ड्यूड है तो वो बस सेल्फी लेते है वो घाट से 30 मीटर दूर रहते है ताकि उनकी सेल्फी सही आए।

पहले हम जब बच्चे तब हम घाट बनाते थे और हम अनंत खुशी मिलती थी लेकिन अब हमारा क्लास नीचा हो जाता।

मेरी किसी से कोई शिकायत तो नहीं बस एक बार से अपने बचपन को जीने की लालसा है

मन की बात | अमन आकाश

थोरा सा शमय निकाल कर इसको परिए..😃 हाँ ठीक है हम बिहारी हैं.. बचपने से अइसे इस्कूल में पढ़े हैं, जहाँ बदमाशी करने पर माट साब "ठोठरी प...