नया फिल्म आने वाला है संजय लीला भंसाली का पद्मावती इस मूवी ने पुरे मार्किट आग लगा रखा है।
जैंसा की हम सब भंसाली तो शुरू से ही के साथ छेड़छाड़ करता आया लेकिन इस बार तो हद ही पार कर दी इस भंसाली कहानी और तथ्य पर गया है शरासर गलत है
| सोर्स : विकिपीडिआ |
इतिहास करो का ये मानना है की -
इस विषय पर जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के मध्यकालीन इतिहास के प्रोफेसर नजफ हैदर कहते हैं कि उनका शोध 14वीं और 16वीं शताब्दी पर है, इसलिए वो भरोसे के साथ कह सकते हैं कि पद्मावती एक काल्पनिक किरदार हैं। यहां तक कि अलाउद्दीन खिलजी चित्तौड़ पर हमले की बात तो करता है, लेकिन पद्मावती का कोई जिक्र नहीं है। उस समय की कोई भी किताब उठा लें, उसमें कहीं भी जिक्र नहीं मिलता है। पद्मावती के लोकप्रिय होने की वजह यह है कि स्थानीय राजपूत पंरपरा के तहत चारणों ने इस किरदार का खूब बखान किया। इस वजह से भी यह कथा काफी लोकप्रिय हुई। यह सच है कि 16वीं शताब्दी में हिन्दी साहित्य पद्मावत में मलिक मुहम्मद जायसी ने इस किरदार को जिंदा किया। हिन्दी साहित्य में पद्मावती की जगह है और साहित्य भी इतिहास का एक हिस्सा होता है। हिन्दी साहित्य को पढ़ाने के लिए पद्मावती का विशेष रूप से इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन इतिहास की किताब में पद्मावती की कोई जगह नहीं है। यदि इतिहास की किताब में पद्मावती है तो यह भ्रमित करने वाला है।
थोड़ी देर के लिए ये उटपटांग लगे फिर भी मानने लायक है लेकिन क्या आप जानते है की मलिक मुह्हमद जायसी ने पद्मावत रचंना १६वी सदी में की थी और रतन सिंह सदी में राजस्थान पर राज किया करते थे अतः ये बाते आधी हक़ीक़त आधा फ़साना है लेकिन फिर भी अगर इस से भावनाये आहत होतृ है मानना है की इस अविलमब बैन कर देना चाहिए और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को इतिहासकारो की एक कमिटी बना कर ऐसे फिल्मो को रोकना चाहिए जो गलत इतिहास।

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