शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

पीएम मोदी की राह पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, बिहार में ला रहे हैं स्टार्टअप बिहार

​बिहार उद्यमी संघ (BEA) ने दावा किया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार छठ बाद ‘स्टार्ट अप बिहार’ योजना लांच करेंगे। ‘बिहार स्टार्ट अप पॉलिसी 2016’ बिहार उद्यमी संघ के सहयोग से बनाई गई है।
राज्य सरकार स्टार्टअप के जरिए युवाओं को बेहतरीन मौका दे रही है। इस योजना में भाषा बाधा न बने इसका ख्याल रखें। आज स्टार्टअप की बड़ी भूमिका है।
बिहार उद्यमी संघ के सचिव अभिषेक सिंह ने बताया कि यह योजना मुख्यमंत्री की पहल पर शुरु की गई है। जो जमीनी स्तर पर युवाओं के बीच काम करेगी। शुरुआती दौर में युवाओं को बिजनेस की शुरुआत करने के लिए सरकार फंड मुहैया कराएगी। सिंह ने कहा कि जिस दिन ‘स्टार्टअप बिहार’ की लाॉंचिंग होगी, उस दिन मुख्यमंत्री बीज खरीदने के लिए 10 लाख रुपये देंगे। उन्होंने कहा कि बिहार पहला ऐसा राज्य होगा, जो बीज खरीदने के लिए युवाओं को फंड मुहैया कराएगा। हालांकि, उद्योग विभाग के अधिकारियों ने यह नहीं बताया कि योजना की शुरुआत, किस तारीख की होगी।
बिहार देश का पहला राज्य हैं जिसने स्टार्टअप योजना के लिए 500 करोड़ का कोष बनाया है। सोमवार से योजना के तहत आवेदन जमा किए जाएंगे। इसके लिए पोर्टल बनाया गया है। सर्च कमेटी आवेदनों को चुनेगी और इसे इंक्यूबेटर के पास भेजा जाएगा। चुने गए आइडिया पर काम करने के लिए सरकार फंड मुहैया कराएगी। विबरेज कॉरपोरेशन के प्रबंध निदेशक मिथिलेश मिश्रा ने कहा कि दुनिया में आज तक कोई आइडिया फेल नहीं हुआ है।
शानदार बिजनेस आइडिया पर मिला सम्मान
उधर, बिहार उद्यमी संघ (बीईए) की ओर से ‘पिच 4 बिहार नामक कार्यक्रम का शुक्रवार को आयोजन किया गया। इसमें बेहतर बिजनेस और मोबाइल एप आइडिया देनेवालों को प्रोत्साहित किया। एसोसिएशन के अध्यक्ष शैलेन्द्र कुमार ने बताया कि नए आइडिया को प्रोत्साहित करने के लिए यह सबसे बड़ा कार्यक्रम है। 612 आवेदनों में से 25 को चुना गया। इनमें सबसे 6 बेहतरीन आइडिया देनेवाले पुरस्कृत किए गए। पुरस्कार वितरण सहकारिता मंत्री आलोक मेहता द्वारा किया गया।

गुरुवार, 27 अक्टूबर 2016

छतों पर लड़कियाँ | एक कविता बिहार से

अलोक धन्वा, हिंदी काव्य जगत में एक और बहुचर्चित और मीडिया में विवादित चेहरा| बिहार के मुंगेर जिले के बेलबिहमा में 1948 ई० में जन्में श्री धन्वा जी क्रांतिकारी कवितायेँ लिखने के लिए जाने जाते रहे हैं| सामाजिक और सांस्कृतिक आन्दोलनों से जुड़ जाने के बाद 14 वर्षों तक लेखन से दूर भी रहे| लेकिन जब वापस आये, हिंदी ने पुनः उसी प्रेम से गले लगाया|
एक कविता बिहार से” में आज PatnaBeats की तरफ से अलोक धन्वा की 1992 में लिखी हुई ऐसी ही एक क्रांतिकारी कविता- ‘छतों पर लड़कियाँ’|

छतों पर लड़कियाँ

अब भी
छतों पर आती हैं लड़कियाँ
मेरी ज़िंदगी पर पड़ती हैं उनकी परछाइयाँ।
गो कि लड़कियाँ आयी हैं उन लड़कों के लिए
जो नीचे गलियों में ताश खेल रहे हैं
नाले के ऊपर बनी सीढियों पर और
फ़ुटपाथ के खुले चायख़ानों की बेंचों पर
चाय पी रहे हैं
उस लड़के को घेर कर
जो बहुत मीठा बजा रहा है माउथ ऑर्गन पर
आवारा और श्री 420 की अमर धुनें।

पत्रिकाओं की एक ज़मीन पर बिछी दुकान
सामने खड़े-खड़े कुछ नौजवान अख़बार भी पढ़ रहे हैं।
उनमें सभी छात्र नहीं हैं
कुछ बेरोज़गार हैं और कुछ नौकरीपेशा,
और कुछ लफंगे भी

लेकिन उन सभी के ख़ून में
इंतज़ार है एक लड़की का !
उन्हें उम्मीद है उन घरों और उन छतों से
किसी शाम प्यार आयेगा !

श्क़े के सदमे उठाने नहीं आसाँ ‘हसरत’ | एक कविता बिहार से

सीना तो ढूँढ लिया मुत्तसिल अपना हम ने,
नहीं मालूम दिया किस को दिल अपना हम ने|

दर ग़रीबी न था कुछ और मयस्सर ‘हसरत’,
इश्‍क़ की नज्र किया दीन ओ दिल अपना हम ने|

“दौर कोई भी हो, इश्क़ की तासीर वही होती है”, नज्में इस बात का पुख्ता सबूत है| पुराने शायरों-कवियों ने जिस शिद्दत से लफ़्ज़ों को पिरोया है, वो ग़ज़ल का भाव और बढ़ा देते हैं| इसी सिलसिले में आज के शायर का ज़िक्र भी आता है| इनकी रचनाएँ यथार्थ के करीब हैं, तभी तो ये तब से लेकर अब तक उसी भाव से पढ़े जाते हैं| बात पुराने शायरों में से एक ‘हसरत’ अज़ीमाबादी की हो रही है| ये 1885 में बिहार के अज़ीमाबाद में जन्मे|
पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ की आज की प्रस्तुति में शामिल हो रही है ‘हसरत’ अज़ीमाबादी की ग़ज़ल- ‘कब तलक हमको न आवेगा नज़र देखें तो’|

कब तलक हमको न आवेगा नज़र देखें तो


कब तलक हमको न आवेगा नज़र देखें तो,
कैसे तरसाता है ये दीदा-ए-तर देखें तो|

इश्‍क़ में उसके कि गुज़रे हैं सर ओ जान से हम,
अपनी किस तौर से हाती है गुज़र देखें तो|

कर के वो जौर ओ सितम हँस के लगा ये कहने,
आह ओ अफ़्गाँ का तिरी हम भी असर देखें तो|

सब्र हो सकता है कब हम से वले मसलेहतन,
आज़माइश दिल-ए-बेताब की कर देखें तो|

ढब चढ़े हो मिरे तुम आज ही तो मुद्दत बाद,
जाएँगे आप कहाँ और किधर देखें तो|

किस दिलेरी से करे है तू फ़िदा जान उस पर,
दिल-ए-जाँ-बाज़ तिरा हम भी हुनर देखें तो|

क्या मजाल अपनी जो कुछ कह सकें हम तुझ से और,
तुझ को भर कर नज़र ऐ शोख़ पिसर देखें तो|

हो चलीं ख़ीरा तो अख़तर-शुमरी से आँखे,
शब हमारी भी कभी होगी सहर देखें तो|

इश्‍क़ के सदमे उठाने नहीं आसाँ ‘हसरत’,
कर सके कोई हमारा सा जिगर देखें तो|

सोमवार, 24 अक्टूबर 2016

छठ विशेष | इस महीने बिहार में पटना, दरभंगा और सहरसा के लिए विशेष ट्रेन।

Northern Railway to press special trains for Bihar to clear ‘Chhat’ rush

Representational ima
ge
Northen Railways
The Anand Vihar-Patna-Anand Vihar Jansadharan ExpressSpecial, Anand Vihar-Saharsa-Anand Vihar Jansadharan Express, Anand Vihar-Jay Nagar-Anand Vihar Jansadharan Express and Sirhind-Saharsa-Ambala unreserved Express will be pressed into service to clear the ‘Chhat’ rush.
 A superfast express train Anand Vihar-Darbhanga-Anand Vihar will also be operational to clear the extra passengers during the festival period, the Northern Railway said in a statement today.
The Anand Vihar-Darbhanga superfast bi-weekly Express Special train will depart from Anand Vihar from October 19 till December 12 on every Wednesday and Saturday at 1.45 PM to reach Darbhanga at 8 AM the next day. In the return direction, the train will depart from Darbhanga from October 20 till November 13 on every Thursday and Sunday at 3.15 PM to reach Anand Vihar at 11.50 AM the next day. Comprising two AC-II coaches, three AC-III coaches, 16 sleeper class and two second class-cum-luggage van coaches, the train will halt at Kanpur, Allahabad, Mughalsarai, Patna and Samastipur stations en route in both thedirections.
The Anand Vihar-Patna Jansadharan Express Special train will depart from Anand Vihar on October 20, 22, 24, 27, 29, 31 and on November 3, 5 and 7 at 11 PM to reach Patna at 2 PM the next day. In the return direction, it will depart from Patna on October 21, 23, 25, 28, 30, November 1, 4, 6 and 8 at 4 PM to reach Anand Vihar at 7 AM the next day. With 16 general class and two second class-cum-luggage van coaches, the train will halt at Kanpur, Allahabad and Mughalsarai stations en route in both the directions.
The Anand Vihar-Saharsa Jansadharan Express Special train will depart from Anand Vihar on October 21, 28 and November 4 at 11 PM to reach Saharsa at 9 PM the next day. In the return direction, it will depart from Saharsa on October 24, 31 and November 7 at 8.30 AM to reach Anand Vihar at 7 AM the next day, the statement said. With 16 general class and two second class-cum-luggage vancoaches, the train is scheduled for halt at Kanpur, Allahabad, Mughalsarai, Patna, Barauni, Begusarai and Khagaria stations en route in both thedirections.The Anand Vihar-Jay Nagar Jansadharan Express Special will depart from Anand Vihar on October 19, 23, 26, 30, November 2, 6 and 9 at 11 PM to reach Jay Nagar at 9 PM the next day.In the return direction, it will depart from Jay Nagar on October 22, 26, 29 and November 2, 5, 9 and 12 at 9.30 AM to reach Anand Vihar at 7 AM the next day, it added. With 16 general class and two second class-cum-luggage van coaches, the train will halt at Kanpur, Allahabad, Mughalsarai, Patna, Barauni, Samastipur and Darbhanga stations en route in both the directions.
Another train pressed into service during the festive season — the Sirhind-Saharsa ExpressSpecial (unreserved) — will run between Sirhind, Saharasa and Ambala Cantt railway stations on a weekly basis. With 16 general class and two second class-cum-luggage van coaches, it stop at Rajpura, Ambala Cantt, Kurukshetra, Karnal, Panipat, Sonipat, Narela, Old Delhi, Kanpur, Allahabad, Mughalsarai, Patna, Barauni, Begusarai and Khagaria stations, according to the statement.

से दुःख तेरे देश इतने निंदिया न आये रे | एक कविता बिहार से

यह सच है, बॉलीवुड का एक युग संगीतकारों और गीतकारों के नाम रहा है| यह भी उतना ही सच है कि नये युग के गीत की तुलना हमेशा पुराने युग से की जाती रही है| नये कलमकारों में बहुत कम ऐसे हैं जिनकी कलम में प्राकृतिक निकटता, मधुरता और सच्चाई की झलक तो है ही साथ ही प्रसिद्धि की चमक भी है|
एक अरसे बाद कोई फिल्म आती है, देसी कहानी के साथ| कब इसके गाने लोगों की प्लेलिस्ट से निकल कर जुबान पर चढ़ जाते हैं, किसी को खबर नहीं होती| खबर किसी को इस बात की भी नहीं लगती कि इन गानों का संगीत जितना खुबसूरत था, उतनी की खूबसूरती से इनके शब्दों को भी पिरोया गया था| हाँ, खबर इसकी भी नहीं लगी कि ये शब्द पिरोने वाला शख्स बिहार से है|
जी! हम बात कर रहे हैं, तनु वेड्स मनु, तनु वेड्स मनु रिटर्न्स और ऊँगा जैसी फिल्मों में गीतकार की भूमिका अदा करने वाले कवि राज शेखर की| श्री शेखर जी बिहार के मधेपुरा जिले से हैं| 22 सितम्बर 1980 ई० को जन्में राजशेखर जी की शिक्षा-दीक्षा दिल्ली विश्वविद्यालय से हुई| इनकी लेखनी में सीधे-सादे देसी शब्दों की महक है और प्राकृतिक सौन्दर्य का रस भी| राज जी खुद भी कहते हैं, “जब गाँव जाता हूँ, वहाँ से कुछ शब्द उठा लाता हूँ”| ‘कितनी दफे दिल ने कहा’ हो, ‘रंगरेज मेरे’ या फिर ‘घनी बावरी’ हर गाने में सीधी और सच्ची बात|
तो पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ से आज जुड़ रहे हैं कवि राजशेखर अपनी एक कविता ‘जंतर-मंतर पे लोरी’ के साथ, जो उन्होंने जंतर-मंतर पर हक की लड़ाई लड़ने वालों की नींद के नाम की है| मगर उससे पहले, नियमगिरि पर्वत के लिए लिखी गयी इनकी एक मशहूर कविता ‘नियमराजा’ से कुछ अंश पेश है|

“हो देव! हो देव!

बस एक बात रहे,

नियमगिरि साथ रहे,

जंगल के माथे पे

उसके दोनों हाथ रहे|

टेसू-पलाश फूले,

लाले-लाले लहर-लहर,

मांदल पर थाप पड़े,

धिनिक-धिनिक, थपड-थपड|

दिमसा का नाच चले,

तनिक-तनिक संवर-संवर,

गाँव-गाँव-गाँव रहे,

दूर रहे शहर-शहर|

वर्दी वाले भाई,

तुम आना इधर,

ठहर-ठहर-ठहर-ठहर|

माटी के कुइया-मुइया

जंगल के हइया-हुइया

कुइया-मुइया, हइया-हुइया

कुइया-मुइया हम|”

जंतर-मंतर पे लोरी

जुलुम तेरा हाय रे,

बढ़ता ही जाए रे,

दुःख तेरे देश इतने

निंदिया न आये रे|

भूखे-भूखे पेट अपने,

निंदिया न आये रे|

दरद से ये देह टूटे

निंदिया न आये रे|

इस तकलीफदेह रात का अँधेरा,

ये शोरोगुल, ये उदासियाँ,

तुम्हारे पीठ पर के नील,

कहो तो इसे साझा कर लें?

और अब सो जाओ थोड़ी देर|

एहसान क्या!

जब फूटेगा भोर,

जब बदलेंगे दिन,

वो भी बाँट लेंगे,

तब कर लेंगे न हिसाब,

सोने-जागने का|

भारी बूटों की धमक से,

झूठे वादों की चमक से,

मजलूमों की कसक से,

निंदिया न आये रे|

खेतों से उठती महक ये,

चाँद-तारे और धमक ये,

सूरज भी कहता फलक से,

अब तो सो जा रे|

अब सो जा साथी रे|

दिनकर डूबता है तो उगता भी तो है हर रोज | एक कविता बिहार से

शुभकामना संदेश के साथ अपनी रचना हमें सौंपी है सुजाता प्रसाद जी ने| महिलाओं के साथ अच्छी बात यह होती है कि इनके दो-दो घर हो सकते हैं| इसी तर्ज़ पर श्रीमती सुजाता जी का भी मायका दरभंगा, बिहार में है और ससुराल बीरगंज, नेपाल में| दिल्ली में निवासित हैं और पेशे से शिक्षिका हैं| 15 सितम्बर 1973 ई० में जन्मीं सुजाता जी स्वतंत्र लेखन कर अपनी पहचान स्थापित कर रही हैं|
पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ में आज शामिल हो रही है कवयित्री सुजाता प्रसाद जी की कविता- ‘उम्मीदों के पायदान’|

उम्मीदों के पायदान

किसके हाथ आया है हर्ष 
किए बिना कोई संघर्ष, 
गर्दिश के ये पल भी जाएंगे 
सुखद छाया के वृक्ष भी लहराएंगे। 
सफ़र की हर एक चुनौती 
श्याम सियाही होती है, 
पल पल साथ चलती कठिनाई 
मेहनत की रायशुमारी होती है।

तू सहमता क्यों है, यह सच है 
वक्त ठहरता कब है? 
बुरा दौर भी खिसकेगा 
लिखित यही कहानी होती है।।

हर सपने में छुपी 
एक सच्चाई होती है, 
उम्मीदों के पायदानों की 
नित नई चढ़ाई होती है। 
दिनकर डूबता है तो 
उगता भी तो है हर रोज, 
गिर-गिर कर उठने वालों की 
सुबह सुहानी होती है।।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2016

बिहार के इस बेटी और प्रसिद्ध कवियित्री के मन में बसल बा बिहार !

हाँ ये वही दिन है २१ अक्टूबर 
1992 जिन दिन शाम  को शशि भूषण मिश्रा  जी  के परिवार और जिंदगी में ऐसे  मिठास  बढ़ गया की मानो वक़्त ने यूँ मुठी भर के मिश्री ही  घोल गया हो ! कुछ दिन में नन्ही  से गुडिया का नाम “नेहा” रखा  गया  !


नेहा फिर बढ़ने लगी , प्रतिभाये खिलने लगी , ओज दिन दिखने लगा , जोश बढ़ने  लगा , शोर मचने  लगा ! हाँ स्कूल से कॉलेज हर तरफ  नेहा  अपने बेहतरीन और सबसे अलग बेहतर सकारात्मक कार्य में ऐसे  संलग्न किया आगे बढाया की ये बचपन में कैमूर  की पहाड़ो  हरियाली में बिहार की ये बेटी की जिंदगी शानदार संतुलित कॉकटेल सा बनता गया ! पहाड़ की तरह अंदर दृढ़ निश्चय , यूँ ऊँचा स्वाभिमान, लक्ष्य के प्रति पत्थर सा अडिग विचार ! लेकिन फिर दूसरी तरफ देखें तो वो ठंढी शीतल हवा और वादियों वाला सुहाना मन , मतवालापन ! नदियों की तरह बस आगे बढ़ना है , बढ़ते रहना है , अपनी मन की करनी है , अच्छा से से भी अच्छी बननी है !
अब ऐसा कुछ पढ़ के लग रहा होगा की कहीं ज्यादा तो नहीं हो गया ! बिलकुल नहीं साहेब, आगे कारनामे और भी हैं !

जैसा चरित्र वैसे पढाई ये कंप्यूटर साइंस से स्नातक करने लगी , और साथ  में शायरी , कविताये भी लिखने लगी, कला के क्षेत्र में भी बराबर रूचि ! निर्मल स्वाभाव के ब्राह्मण परिवार की ये बिटिया कभी आपको अपने निर्मलता से , तो कभी निश्छलता से , तो कभी विषय वस्तु की  जानकारी से , तो कभी अपनी मधुर कविता से जीत लेगी ! जिससे भी मिलती है दीवाना करती ये मंद ठंढी हवा के झोके की तरह बहती रहती है !
कहा था न नदियाँ बात कहाँ मानती है , सीमा कहाँ तय कर पाती है , दायरा यहाँ भी नहीं है ! इन्होने अपने कविता संग्रह बनाई , किताब लिखी एक नाम “जीवन के नुपुर” — निपुण लेखिका “नेहा नुपुर” ! आप भी पढ़ के अवगत हो  सकते हैं , अब तो ये online भी उपलब्ध है Amazon पे
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और ये प्रकृति से जुडा हुआ प्रकृति वाला इंसान बच्चो से कहाँ दूर रह पाता है , खुद को दूर नहीं रख पाता है ! इसलिए ये सरकारी स्कूल में शिक्षिका बन के जिंदगी को और खुशनुमा कर रही हैं , और अपने जैसे और बेहतर कई जिंदगी बना रही हैं ! ज्ञात हो कि बिहार की वह बटी नेहा नूपुर ही है जिसने बिहार को बदनाम करने वालों और बिहार में जंगलराज कहने वालों को खुला पत्र लिख, अपने तर्क और शब्दों के वाण से सबकी बोलती बंद करा दी थी।
अपने मातृभूमि और बिहार के लिए इनका प्रेम, बिहार पर इनके द्वारा लिखे गये एक प्रसिद्ध कविता से झलकता है।
गाँव-घर से मिलल संस्कार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

दुई-चार दिन तनी घरहूँ बितईहऽ,
इहवाँ के खुसबू पूरा देस में फइलइहऽ|
माटी के दीहल अधिकार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

जाई के बिदेस, देस के बोली जनि भुलइहऽ,
लईकन के माई-बाबू कहे के सिखइहऽ|
जरि जाई देंहिया बाकिर बेवहार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

गंगा के घाट, गुल्ली-डंटा के खेला,
हर साल लागे इंहा सोनपुर मेला|
एह सभ में रमल तोहार पेयार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

सिंगापूर-अमेरिका में छठी माई के पूजन,
एके साथे होखे कुआरे पितरि अरपन|
एहिजा के तीज-त्योहार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई|

नस-नस में रसल बिचार कहाँ जाई,
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई||

मन की बात | अमन आकाश

थोरा सा शमय निकाल कर इसको परिए..😃 हाँ ठीक है हम बिहारी हैं.. बचपने से अइसे इस्कूल में पढ़े हैं, जहाँ बदमाशी करने पर माट साब "ठोठरी प...