सीना तो ढूँढ लिया मुत्तसिल अपना हम ने,
नहीं मालूम दिया किस को दिल अपना हम ने|
दर ग़रीबी न था कुछ और मयस्सर ‘हसरत’,
इश्क़ की नज्र किया दीन ओ दिल अपना हम ने|
“दौर कोई भी हो, इश्क़ की तासीर वही होती है”, नज्में इस बात का पुख्ता सबूत है| पुराने शायरों-कवियों ने जिस शिद्दत से लफ़्ज़ों को पिरोया है, वो ग़ज़ल का भाव और बढ़ा देते हैं| इसी सिलसिले में आज के शायर का ज़िक्र भी आता है| इनकी रचनाएँ यथार्थ के करीब हैं, तभी तो ये तब से लेकर अब तक उसी भाव से पढ़े जाते हैं| बात पुराने शायरों में से एक ‘हसरत’ अज़ीमाबादी की हो रही है| ये 1885 में बिहार के अज़ीमाबाद में जन्मे|
पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ की आज की प्रस्तुति में शामिल हो रही है ‘हसरत’ अज़ीमाबादी की ग़ज़ल- ‘कब तलक हमको न आवेगा नज़र देखें तो’|
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