गुरुवार, 28 सितंबर 2017

चमत्कार है इस माटी में इस माटी का तिलक लगाओ | एक कविता बिहार से

बाबा नागार्जुन हिन्दी और मैथिली के अप्रतिम लेखक और कवि थे। उनका असली नाम वैद्यनाथ मिश्र था परंतु हिन्दी साहित्य में उन्होंने नागार्जुन तथा मैथिली में यात्री उपनाम से रचनाएँ कीं। बाबा नागार्जुन बचपन से ही घुमक्कड़ प्रवृति के कारण “यात्री” हो गए।

बाबा नागार्जुन के काव्य में अब तक की पूरी भारतीय काव्य-परंपरा ही जीवंत रूप में उपस्थित देखी जा सकती है। उनका कवि-व्यक्तित्व कालिदास और विद्यापति जैसे कई कालजयी कवियों के रचना-संसार के गहन अवगाहन, बौद्ध एवं मार्क्सवाद जैसे बहुजनोन्मुख दर्शन के व्यावहारिक अनुगमन तथा सबसे बढ़कर अपने समय और परिवेश की समस्याओं, चिन्ताओं एवं संघर्षों से प्रत्यक्ष जुड़ा़व तथा लोकसंस्कृति एवं लोकहृदय की गहरी पहचान से निर्मित है।
नागार्जुन सही अर्थों में भारतीय मिट्टी से बने आधुनिकतम कवि हैं।जन संघर्ष में अडिग आस्था, जनता से गहरा लगाव और एक न्यायपूर्ण समाज का सपना, ये तीन गुण नागार्जुन के व्यक्तित्व में ही नहीं, उनके साहित्य में भी घुले-मिले हैं। निराला के बाद नागार्जुन अकेले ऐसे कवि हैं, जिन्होंने इतने छंद, इतने ढंग, इतनी शैलियाँ और इतने काव्य रूपों का इस्तेमाल किया है। पारंपरिक काव्य रूपों को नए कथ्य के साथ इस्तेमाल करने और नए काव्य कौशलों को संभव करनेवाले वे अद्वितीय कवि हैं।
भाषा पर बाबा का गज़ब अधिकार है। देसी बोली के ठेठ शब्दों से लेकर संस्कृतनिष्ठ शास्त्रीय पदावली तक उनकी भाषा के अनेकों स्तर हैं। उन्होंने तो हिन्दी के अलावा मैथिली, बांग्ला और संस्कृत में अलग से बहुत लिखा है। जैसा पहले भाव-बोध के संदर्भ में कहा गया, वैसे ही भाषा की दृष्टि से भी यह कहा जा सकता है कि बाबा की कविताओं में कबीर से लेकर धूमिल तक की पूरी हिन्दी काव्य-परंपरा एक साथ जीवंत है। बाबा ने छंद से भी परहेज नहीं किया, बल्कि उसका अपनी कविताओं में क्रांतिकारी ढंग से इस्तेमाल करके दिखा दिया। बाबा की कविताओं की लोकप्रियता का एक आधार उनके द्वारा किया गया छंदों का सधा हुआ चमत्कारिक प्रयोग भी है।

प्रस्तुत है बाबा नागार्जुन की एक कविता, जिसका शीर्षक है- ‘भोजपुर’|

 

1:
यहीं धुआँ मैं ढूँढ़ रहा था
यही आग मैं खोज रहा था
यही गंध थी मुझे चाहिए
बारूदी छर्रें की खुशबू!
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ…
बारूदी छर्रें की खुशबू!
भोजपुरी माटी सोंधी हैं,
इसका यह अद्भुत सोंधापन!
लहरा उठ्ठी
कदम–कदम पर, इस माटी पर
महामुक्ति की अग्नि–गंध
ठहरो–ठहरो इन नथनों में इसको भर लूँ
अपना जनम सकारथ कर लूँ!

2

मुन्ना, मुझको
पटना–दिल्ली मत जाने दो
भूमिपुत्र के संग्रामी तेवर लिखने दो
पुलिस दमन का स्वाद मुझे भी तो चखने दो
मुन्ना, मुझे पास आने दो
पटना–दिल्ली मत जाने दो

3

यहाँ अहिंसा की समाधि है
यहाँ कब्र है पार्लमेंट की
भगतसिंह ने नया–नया अवतार लिया है
अरे यहीं पर
अरे यहीं पर
जन्म ले रहे
आजाद चन्द्रशेखर भैया भी
यहीं कहीं वैकुंठ शुक्ल हैं
यहीं कहीं बाधा जतीन हैं
यहां अहिंसा की समाधि है…

4

एक–एक सिर सूँघ चुका हूँ
एक–एक दिल छूकर देखा
इन सबमें तो वही आग है, ऊर्जा वो ही…
चमत्कार है इस माटी में
इस माटी का तिलक लगाओ
बुद्धू इसकी करो वंदना
यही अमृत है¸ यही चंदना
बुद्धू इसकी करो वंदना

यही तुम्हारी वाणी का कल्याण करेगी
यही मृत्तिका जन–कवि में अब प्राण भरेगी
चमत्कार है इस माटी में…
आओ, आओ, आओ, आओ!
तुम भी आओ, तुम भी आओ
देखो, जनकवि, भाग न जाओ
तुम्हें कसम है इस माटी की
इस माटी की/ इस माटी की/ इस माटी की

बुधवार, 27 सितंबर 2017

मिलिए मिथिला,मिथिलावासी और मिथिला की धरोहर से : मिथिला के विरासत

नई श्रृंखला शुरू कर रहे है शायद हमारे श्रृंखलाओं की पहले कड़ी है मिथिला की विरासत को दर्शाने के लिए नई शुरुआत

बिहार के दरभंगा जिले में काली रूप में मां श्यामा बड़े ही भव्य रूप में भक्तों को दर्शन देती हैं. इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यह मंदिर ने केवल चिता पर बना है, बल्कि मंदिर के अंदर हर तरह के मागंलिक कार्य भी किए जाते हैं.
बिहार के दरभंगा जिले में मां काली का यह भव्य मंदिर मौजूद है, जिन्हें यहां भक्त श्यामा माई के नाम से पुकारते हैं. इस मंदिर के निर्माण की कहानी जिसे सुनकर सब हैरान हो जाते हैं. मां काली का यह मंदिर दरभंगा राज परिवार के महान साधक महाराज रामेश्वर सिंह की चिता पर बना है. इस मंदिर के अंदर दक्षिण दिशा की ओर एक खास स्थान पर आज भी लोग साधक महाराज रामेश्वर सिंह के चिता की तपिस को महसूस करते हैं, फिर चाहे कड़ाके की ठंड ही क्यों न पड़ रही हो.

यहां के लोगों का मानना है कि पूरे भारत में काली की इतनी बड़ी मूर्ति कहीं नहीं है. मूर्ति का विग्रह अलौकिक और अविस्मरणीय है. भक्तों को मां श्यामा के दर्शन से ही अदभुत सुख की प्राप्ति होती है. कहते है अगर भक्त नम आंखो से कुछ मांगते हैं तो उनकी इच्छा अवश्य पूरी होती है. इस विशालकाय मंदिर की स्थापना 1933 में दरभंगा महाराजा कामेश्वर सिंह ने की थी, जिसमें मां श्यामा की विशाल मूर्ति भगवन शिव की जांघ एवं वक्षस्थल पर अवस्थित है. मां काली की दाहिनी तरफ महाकाल और बायीं ओर भगवान गणेश और बटुक की प्रतिमाएं स्थापित हैं. चार हाथों से सुशोभित मां काली की इस भव्य प्रतिमा में मां के बायीं ओर के एक हाथ में खड्ग, दूसरे में मुंड तो वहीं दाहिनी ओर के दोनों हाथों से अपने पुत्रों को आशीर्वाद देने की मुद्रा में विराजमान हैं.

मां श्‍यामा के दरबार में होने वाली आरती का विशेष महत्व है. माना जाता है कि जो भी मां की इस आरती का गवाह बन गया उसके जीवन के सारे अंधकार दूर हो जाते हैं, साथ ही भक्तों की समस्त मनोकामना भी पूरी हो जाती है. मंदिर के गर्भगृह में जहां एक तरफ काली रूप में मां श्यामा के भव्य दर्शन होते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रार्थना स्थल के मंडप में सूर्य, चंद्रमा ग्रह, नक्षत्रों सहित कई तान्त्रिक यंत्र मंदिर की दीवारों पर देखने को मिलते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस मंदिर में मां श्यामा की पूजा तांत्रिक और वैदिक दोनों ही रूपों में की जाती है.

आमतौर पर हिन्दू रीती रिवाज के अनुसार यह परंपरा रही है की किसी भी व्यक्ति का कोइ भी मांगलिक संस्कार होने के एक साल तक वह श्‍मशान नहीं जाता है, लेकिन मां श्यामा के इस मंदिर में नए जोड़े मां का आशीर्वाद ही लेने नहीं बल्कि श्मसान भूमि पर बने इस मंदिर अनेकों शादियां भी होती है.

जय मिथिला,जय मैथिल

गांव,गांव के लोग और गांव का इंटरनेट

गांव का ब्लॉग है यहां गांव और गांव से जुड़ी वो बाते होती है जिनसे हम और आप खुद को जोड़ते है।
गांव का नाम सुनकर लोगो के में में ये तस्वीर उभरती है कि कैसे गांव में लोग गंदगी में रहते है, जानवरों के पास सोते है लेकिन बीते कुछ सालों में सचमुच गांव का रहन–सहन बदला,गांव की तस्वीर बदली है और तो और गांव के लोगो को भी बदलते देखा है हमने।
पहले गांव में बिजली नहीं थी शाम को दुकानों पर युवाओं का हुजूम उमड़ता था,राजनीति पर संसद बैठता था लोग अपना राय रखते थे और खूब मजा आता था जोकि व्यक्तिगत रूप से मुझे काफी पसंद था और मेरा मानना है कि आज मै जो भी चुतियपा कर रहा हूं उसी की देन है लेकिन अब लोगो मै वो उत्साह नहीं रहा हर कोई टीवी और बीवी में व्यस्त है।
उस समय की बात याद आती है जब भी हम कभी घर से बाहर निकलते थे हमे कोई ना कोई साथी मिलता था जिसके साथ हम गप्पे मार सकते थे, बक्चोदी कर सकते लेकिन अब वो दोस्त कहीं खो गए है,अब गांव में वो मजा नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था और इन बातो से मै ये समझता हूं कि सचमुच मेरा देश बदल रहा है लेकिन  बदलाव से मै खुश नहीं हूं,इसमें मुझे वो भारत नहीं दिखता हो मैंने कभी देखा था और आज भी मन में खयाल आता है बचपन के दिन भले थे कितने

अब गांव में हर कोई इंटरनेट का प्रयोग करता है लेकिन उस इंटरनेट से बस पोर्न और यूट्यूब का ट्रेडिंग चूतियापा ही देखता है

सोमवार, 25 सितंबर 2017

छठ की तैयारी

छठ मतलब बिहार का सबसे बड़ा पर्व,वो पर्व जिसके लिए लोग सबसे ज्यादा बेताब होते थे,वो पर्व जिसमें हम सब एक जगह होते थे लेकिन उस पर्व के प्रति लोगों में अब वो उत्साह नहीं रहा जैसा लोगो मै पहले हुआ करता था अब तो हर कोई अपने दरवाजे पर ही छठ माना लेता है  ।

उसी छठ के बारे में आज यू ही लिखने का मन कर गया नेट भी काफी अच्छा चल रहा है आज,तो सुनाते है असली छठ की कहानी जिसे हमने जिया है।

छठ में लोग छठ घाट पर छठ से 15 दिन पहले से आना शुरू कर देते है मेरा घर बिल्कुल घाट के पास है वो भी बाबा बैकुंठ नाथ की गोद में है से बचपन से देखता आया हूं कैसे लोग 15 दिन पहले से ही घाट छेकना शुरू कर देते थे लेकिन पिछले तीन चार साल से कोई नहीं आता बस 2 दिन पहले 2 मजदूर लगा कर पूरा साफ़ करवा देते है और फिर 2 टाइम लोग आ कर सूर्य को अर्घ्य देते है और फिर किसको क्या मतलब की घाट पर क्या होता,मै खुद अपनी बात बताता हूं जब मै 8–9 साल का रहा होऊंगा उस टाइम मै और मेरे दोस्त जब सभी घाट से चले जाते थे तब
मोमबत्ती और दीपक चुना करता था और फिर उससे हम खेलते थे लेकिन अब बच्चे हाइजीन ही गए है वो गंदे चीजों को नहीं छूते चुकी वो कूल्ड्यूड है तो वो बस सेल्फी लेते है वो घाट से 30 मीटर दूर रहते है ताकि उनकी सेल्फी सही आए।

पहले हम जब बच्चे तब हम घाट बनाते थे और हम अनंत खुशी मिलती थी लेकिन अब हमारा क्लास नीचा हो जाता।

मेरी किसी से कोई शिकायत तो नहीं बस एक बार से अपने बचपन को जीने की लालसा है

मन की बात | अमन आकाश

थोरा सा शमय निकाल कर इसको परिए..😃 हाँ ठीक है हम बिहारी हैं.. बचपने से अइसे इस्कूल में पढ़े हैं, जहाँ बदमाशी करने पर माट साब "ठोठरी प...