शनिवार, 19 नवंबर 2016

गाँव की लड़कियाँ | एक कविता बिहार से

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संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह ‘आवाज भी देह है’ को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया तथा उन्हें जयपुर में दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया।  संजय औरंगाबाद  दाउदनगर महाविद्यालय से सेवारत अध्यापक एस के शांडिल्य और अंकोढा मिडिल स्कूल में कर्यरत शिक्षिका मांडवी पांडेय के बडे पुत्र हैं। संजय अपने स्कूली जीवन से ही कविता लिखा करते थे। दाउदनगर के विवेकानंद मिशन स्कूल से शिक्षक के रुप में उन्होंने अपने कैरियर की शुरुवात की और अभी गोपालगंज सैनिक स्कूल में राजनीतिक शास्त्र  शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। बिहारगीत भी उन्होंने ही लिखा था जिसके लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था।  बोधि पुस्तक पर्व के चौथे सेट की दस और दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना के तहत प्रकाशित पांच पुस्तकों का लोकार्पण पिछले सोमवार (दिनांक  ०७ नवम्बर २०१६ ) की शाम पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर के सभागार में हुआ।
कहते हैं की भारत की आत्मा हमारे गॉवों  में बसती है , आज के माहौल में जहाँ नारीवाद का  विष्कृत  रूप दिखने को मिलता है , वहाँ हमे आइना दिखाती हुई संजय कुमारशांडिल्य की एक कविता बिहार से में यह कविता –

मैं कहूँ कि गाँव की लड़कियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लड़कियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक

दबंगों की बेहिस छेड़ को जमाने से ज्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लड़कियाँ
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लड़कियाँ अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फर्क

मैं कहूँ कि गाँव की लड़कियाँ किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लड़कियाँ खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूङी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं खरीदना होता है

गाँव की लड़कियाँ गाँव की लड़कियाँ होती हैं
खूब गहरी 
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जङें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई

इन घनी लड़कियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं

आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?

बिहार विधानमंडल के इतिहास में जुड़ेगा नया अध्याय ,भवन का उद्घाटन आज

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बिहार विधानमंडल के इतिहास में शनिवार को एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। विधानमंडल के नए भवन का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करेंगे। इसके लिए पूरा विधानमंडल भवन सज-धज कर तैयार हो गया है।उद्घाटन समारोह में विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी, विधानपरिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी व प्रेम कुमार समेत सभी मंत्री और अधिकतर विधायक और विधान पार्षद मौजूद रहेंगे।चार सौ करोड़ की लागत से तैयार हुआ है भवनकरीब चार सौ करोड़ रुपए की लागत से यह बहुप्रतीक्षित विधानमंडल के नए भवन का निर्माण किया गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रोक हटने के बाद निर्माण कार्य तेजी से चलाया जा रहा था।

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

मैं तेरे इश्क़ में सरमाया-दार बन के रहा | एक कविता बिहार से


हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए,
ये रेत जैसा बदन आँधियों के काम तो आए|


बिहार के बेगुसराय में 1 जुलाई 1981 ई० को जन्में ग़ालिब अयाज़ जी जीविका के सिलसिले में दिल्ली में निवासित हैं| जीवन के मीठे और कटु अनुभवों को बहुत ही खूबसूरती से बयाँ करते हैं| कॉलेज के जमाने से लिखने का शौक चढ़ा और तभी से उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में छपते आ रहे हैं| अब तक कोई किताब तो प्रकाशित नहीं की इन्होंने मगर इतनी जगह छप चुके हैं कि ग़ज़ल लिखने वालों में नाम और पहचान बना चुके हैं|
तो आइये आज पटनाबीट्स पर ‘एक कविता बिहार से’ में एक युवा गज़लकार ग़ालिब अयाज़ जी की ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं, कठिन शब्दों के अर्थ के साथ|

ग़ज़ल 1

कभी गुमान कभी ए’तिबार बन के रहा,
दयार-ए-चश्म में वो इंतिज़ार बन के रहा|

हज़ार ख़्वाब मिरी मिलकियत में शामिल थे,
मैं तेरे इश्क़ में सरमाया-दार बन के रहा|

तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन,
कभी कभी तो वो इस दिल पे बार बन के रहा|

उसी के नाम करूँ मैं तमाम अहद-ए-ख़याल,
दरून-ए-जाँ जो मिरे सोगवार बन के रहा|

अगरचे शहर में ममनू थी हिमायत-ए-ख़्वाब,
मगर ये दिल सबब-ए-इंतिशार बन के रहा|

[दयार-ए-चश्म – House of Eyes, सरमाया-दार – Capitalist, बार – Load/ Burden, अहद-ए-ख़याल – Period of thought, दरून-ए-जाँ – Inside Life, सोगवार – Sad, ममनू – Prohibited, हिमायत-ए-ख़्वाब – Support of Dreams,  सबब-ए-इंतिशार – Cause of Anarchy] 

ग़ज़ल 2

हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो,
अब ये दिल बे-क़रार हो कि न हो|

मर्ग-ए-अम्बोह देख आते हैं,
आँख फिर अश्क-बार हो कि न हो|

कर्ब-ए-पैहम से हो गया पत्थर,
अब ये सीना फ़िगार हो कि न हो|

फिर यही रूत हो ऐन मुमकिन है, 
पर तिरा इंतिज़ार हो कि न हो|

शाख़-ए-ज़ैतून के अमीं हैं हम,
शहर में इंतिशार हो कि न हो|

शेर मेरे संभाल कर रखना,
अब ग़ज़ल मुश्क-बार हो कि न हो|


[ज़ेर-ए-बार – Thankful, मर्ग-ए-अम्बोह – Death of Mob, कर्ब-ए-पैहम – Constant Pain, ऐन – Exact]

सोमवार, 14 नवंबर 2016

आज बिहार के इस जिला का 44वाँ स्थापना दिवस मनाया जा रहा है

समस्तीपुर भारत गणराज्य के बिहाप्रान्त में दरभंगा प्रमंडल स्थित एक शहर
एवं जिला है। समस्तीपुर के उत्तर में दरभंगा, दक्षिण में गंगा नदी और पटना जिला, पश्चिम में मुजफ्फरपुर एवं वैशाली, तथा पूर्व में बेगूसराय एवं खगड़िया जिले है। यहाँ शिक्षा का माध्यम हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी
है लेकिन बोल-चाल में बज्जिका और मैथिली बोली जाती है। मिथिला क्षेत्र के परिधि पर स्थित यह जिला उपजाऊ कृषि प्रदेश है। समस्तीपुर पूर्व मध्य रेलवे का मंडल भी है। समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेशद्वार भी
कहा जाता है।
नामाकरण
समस्तीपुर का परंपरागत नाम सरैसा है। इसका वर्तमान नाम मध्य काल में बंगाल एवं उत्तरी बिहार के शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास ((१३४५-१३५८ ईस्वी) के नाम पर पड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि
इसका प्राचीन नाम सोमवती था जो बदलकर सोम वस्तीपुर फिर समवस्तीपुर और समस्तीपुर हो गया।
Samastipur
इतिहास
समस्तीपुर राजा जनक के मिथिला प्रदेश का अंग रहा है। विदेह राज्य का अंत होने पर यह वैशाली गणराज्य का अंग बना। इसके पश्चात यह मगध के मौर्य, शुंग, कण्व और गुप्त शासकों के महान साम्राज्य का हिस्सा रहा।
ह्वेनसांग के विवरणों से यह पता चलता है कि यह प्रदेश हर्षवर्धन के साम्राज्य के अंतर्गत था। १३ वीं सदी में पश्चिम बंगाल के मुसलमान शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास के समय मिथिला एवं तिरहुत क्षेत्रों का
बँटवारा हो गया। उत्तरी भाग सुगौना के ओईनवार राजा (1325-1525 ईस्वी) के कब्जे में था जबकि दक्षिणी एवं पश्चिमी भाग शम्सुद्दीन इलियास के अधीन रहा।
समस्तीपुर का नाम भी हाजी शम्सुद्दीन के नाम पर पड़ा है। शायद हिंदू और मुसलमान शासकों के बीच बँटा होने के कारण ही आज
समस्तीपुर का सांप्रदायिक चरित्र समरसतापूर्ण है। ओईनवार राजाओं को कला, संस्कृति और साहित्य का बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। शिवसिंह के पिता देवसिंह ने लहेरियासराय के पास देवकुली की स्थापना
की थी। शिवसिंह के बाद यहाँ पद्मसिंह, हरिसिंह, नरसिंहदेव, धीरसिंह, भैरवसिंह, रामभद्र, लक्ष्मीनाथ, कामसनारायण राजा हुए। शिवसिंह तथा भैरवसिंह द्वारा जारी किए गए सोने एवं चाँदी के सिक्के यहाँ के इतिहास ज्ञान का अच्छा स्रोत है। अंग्रेजी राज कायम होने पर सन १८६५ में तिरहुत मंडल के अधीन समस्तीपुर अनुमंडल बनाया गया। बिहार राज्य जिला पुनर्गठन आयोग के रिपोर्ट के आधार पर इसे दरभंगा प्रमंडल के अंतर्गत १४ नवम्बर १९७२ को जिला बना दिया गया। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध हुए स्वतंत्रता आंदोलन में समस्तीपुर के क्रांतिकारियों ने महती भूमिका निभायी थी। यहाँ से कर्पूरी ठाकुर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं।

सोमवार, 7 नवंबर 2016

छूटे न अबकी छठ के बरतिया | एक कविता बिहार से

गोबर से, मिट्टी से, लीपा हुआ घर-दुआर
नया धान, कूद फाँद, गुद-गुद टटका पुआर
छठ मने ठेकुआ, सिंघारा-मखाना
छठ मने शारदा सिन्हा जी का गाना

बच्चों की रजाई में भूत की कहानी
देर राह तक बतियाती माँ, मौसी, मामी
व्रत नहीं, छठ मने हमरे लिए तो
व्रत खोल पान खाके हँसती हुई नानी

छठ मने छुट्टी
छठ मने हुलास
छठ मने ननिहाल
आ रहा है पास


छठ महापर्व से हर बिहारवासी का एक गहरा जुड़ाव रहा है| लोकास्था का यह पर्व कुछ ऐसी ही यादें दे जाता है| इन्हीं यादों को शब्दों के माध्यम से सफलतापूर्वक चित्रित किया है बॉलीवुड के संजीदा गीतकारों में गिने जाने वाले युवा गीतकारराजशेखर ने| इन्होंने भी स्वीकार किया है कि “छठ मने शारदा सिन्हा जी का गाना”|
हाल ही में छठ पर्व की आस्था के साथ एक गीत रिलीज़ किया गया है| इसे गाया है मशहूर गायिका और बिहार की आवाज कही जाने वाली पद्मश्री से सम्मानित शारदा सिन्हा जी ने| इन्हीं के एल्बम से एक गीत आज आपके सामने आ रहा है जिसे लिखा है डॉ. शांति जैन ने| इस गीत का विषय आज के बाजारवाद में मुश्किल से उपलब्ध हो पाने वाली पूजा की सामग्री है| व्रती किस कदर डर जाते हैं जब उन्हें सामग्री नहीं मिल पाती और वो उस स्थिति में यही सोचते हैं कि जरूर उनसे कोई अपराध हुआ होगा जिसकी वजह से छठी माँ नाराज हैं और उन्हें पूजा की सामग्री भी नहीं मिल रही|
पटनाबीट्स के ‘एक कविता बिहार से’ में आज शामिल हो रहा है छठी माँ को समर्पित गीत- ‘सुपवो ना मिले’|

पटना सहरिया में सुपवो बुना ला हो
सुपवो ना मिले माई हे, कवन अवगुनवा|
रखिहऽ आसीस मईया, करीले जतनवा,
उगिहऽ सुरुज देव, हमरे अंगनवा|

सगरो बजरिया में गेंहुआ बिकाला हो
गेन्हुओं ना मिले माई हे, कवन अवगुनवा|

हाजीपुर सहरिया में केलवा बिकाला हो
केलवो ना मिले माई हे, कवन अवगुनवा|

बड़ा रे महात्तम छठी ओ बरतिया
मनसा पुरावेली सब छठी मईया
छूटे न अबकी छठ के बरतिया
छुट्टी लेके घरे अईह, करब परबीया| 

रखिहऽ आसीस मईया, करीले जतनवा,
उगीं ना सुरुज देव, हमरे अंगनवा|

शनिवार, 5 नवंबर 2016

बिहार के मुंगेर क्षेत्र में पुत्र प्राप्ति को लेकर माता सीता ने की थी छठ महापर्व की शुरुआत

त्योहारों और पर्वों के देश भारत में हर उत्सव को बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. साल का ऐसा कोई महीना नहीं , जिसका अंत किसी बड़े व्रत और त्योहार के बिना गुज़र जाये. इन तीज-त्योहारों का सांस्कृतिक और भौगोलिक, दोनों रूपों में महत्त्व होता है. दीपावली के बाद आने वाला छठ पर्व का त्योहार भी कुछ इसी तरह का पर्व है. किसी समय केवल बिहार में मनाया जाने वाला यह पर्व आज बिहार के अलावा झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी बड़ी धूमधाम से मनाया जाने लगा है.

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कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाये जाने वाले इस पर्व के पीछे समय के साथ होता सांस्कृतिक संक्रमण बड़ी वजह है. बिहार की बेटियां जहां-जहां शादियां करके गई, वहां-वहां वह इस त्योहार को श्रद्धा के साथ मनाने लगी और इस तरह से आज यह पर्व बिहार के पटना घाट से लेकर दिल्ली के यमुना घाट तक मनाया जाता है.

शुरुआती दौर


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छठ पूजा वास्तव में सूर्य की उपासना का पर्व है. सूर्य को ब्रह्मांड की उर्ज़ा का स्रोत भी कहा जाता है. ऋग्वेद में भी सूर्य उपासना के बारे में ज़िक्र किया गया है. ऋग्वेद के समय से चली आ रही छठ पूजा व्यवस्थित रूप से मध्यकाल में ज़्यादा प्रचलन में आई. सूर्य को शक्ति और ऊर्जा का देवता माना जाता है. मान्यता है कि छठ माता सूर्य भगवान की बहन है और इन्हीं को प्रसन्न करने के लिए सूर्य की आराधना जीवन के सबसे महत्वपूर्ण घटक जल में खड़े होकर की जाती है.

राम और सीता से जुड़ा है छठ पर्व का गहरा नाता


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बिहार के मुंगेर क्षेत्र में सबसे पहले माता सीता ने इस पर्व को महापर्व के रूप में मनाया था. भगवान श्री राम जब अपने पिता दशरथ के कहने पर वनवास के लिए निकले थे, तो माता सीता के मन में वनवास के दौरान आने वाले संकटों को लेकर काफ़ी शंकाएं थी.

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वनवास के प्रारम्भिक समय में प्रभु श्री राम, मां सीता के साथ मुद्गल ऋषि के आश्रम में पहुंचे. वहां मां सीता ने माता गंगा से वनवास का समय सकुशल बीत जाने को लेकर छठ माता की पूजा की थी.

पुत्र प्राप्ति और रामराज्य के लिए भी की थी सीता ने छठ माता की पूजा


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वनवास पूरा करने के बाद जब प्रभु राम अयोध्या वापस लौटे, तो उन्होंने रामराज्य के लिए राजसूय यज्ञ करने का निर्णय लिया. यज्ञ शुरू करने से पहले उन्हें वाल्मीकि ऋषि ने कहा कि मुद्गल ऋषि के आये बिना यह राजसूय यज्ञ सफ़ल नहीं हो सकता है.

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जब राम और सीता मुद्गल ऋषि को यज्ञ में आने का निमन्त्रण देने गये, तो मुद्गल ऋषि ने मां सीता को छठ का व्रत करने की सलाह दी. इस प्रकार मां सीता ने छठ माता से पुत्र प्राप्ति और रामराज्य की स्थापना के लिए कामना की.
विज्ञान में भी सूर्य को उर्ज़ा का स्रोत माना गया है और हमारे वेदों में भी कई बार सूर्य की महिमा का उल्लेख किया गया है. छठ पूजा के रूप में सूर्य उपासना करके साधक अपने अंदर एक ऊर्जावान शान्ति का भाव महसूस करता है. 

बुधवार, 2 नवंबर 2016

इस वजह से मनाया जाता है आस्था का महापर्व छठ

दिवाली से शुरू होकर नौ दिनों तक चलने वाले हिंदुओं के प्रमुखों त्योहारों में लोक आस्था के महापर्व छठ पूजा का विशेष स्थान है। छठ पूजा उत्तर भारत में बेहद अहम त्योहार या पर्व है। चार दिनों तक होने वाले इस त्योहार को महापर्व भी कहते हैं। इस पर्व में भगवान सूर्य की उपासना और अर्घ्य देने का नियम है। इस बार छठ पूजा की तिथि चार नवंबर से लेकर सात नवंबर तक है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस पर्व को मनाने को लेकर 4 तरह की कहानियां प्रसिद्ध है।

छठ पूजा कार्तिक शुक्ल की षष्ठी को मनाई जाती है। यह चार दिवसीय महापर्व है जो चौथ से सप्तमी तक मनाया जाता है। इसे कार्तिक छठ पूजा कहा जाता है। इसके अलावा चैत महीने में भई यह पर्व मनाया जाता है जिसे चैती छठ पूजा कहते हैं। पष्ठी के दिन माता छठी की पूजा की जाती हैं, जिन्हें धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उषआ (छठी मैया) कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार छठी मइया और भगवान सूर्य करीबी संबंधी हैं। इस पर्व के दौरान छठी मइया के अलावा भगवान सूर्य की पूजा-आराधना होती है। कहा जाता है कि जो व्यक्ति इन दोनों की अर्चना करता है उनकी संतानों की रक्षा छठी माता करती हैं।
पढ़िए इस महापर्व से जुड़ी 4 कहानियां
सूर्य की उपासना से हुई राजा प्रियवंद दंपति को संतान प्राप्ति
बहुत समय पहले की बात है राजा प्रियवंद और रानी मालिनी की कोई संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप के निर्देश पर इस दंपति ने यज्ञ किया जिसके चलते उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। दुर्भाग्य से यह उनका बच्चा मरा हुआ पैदा हुआ. इस घटना से विचलित राजा-रानी प्राण छोड़ने के लिए आतुर होने लगे। उसी समय भगवान की भगवान ब्रह्मा की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने बताया कि उनकी पूजा करने से संतान सुख की प्राप्ति होगी। राजा प्रियंवद और रानी मालती ने देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी। और तभी से छठ पूजा होती है।
अयोध्या लौटने पर भगवान राम ने किया था राजसूर्य यज्ञ
विजयादशमी के दिन लंकापति रावण के वध के बाद दिवाली के दिन भगवान राम अयोध्या पहुंचे। रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए भगवान राम ने ऋषि-मुनियों की सलाह से राजसूर्य यज्ञ किया। इस यज्ञ के लिए अयोध्या में मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया गया। मुग्दल ऋषि ने मां सीते को कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इसके बाद मां सीता मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।
जब कर्ण को मिला भगवान सूर्य से वरदान
छठ या सूर्य पूजा महाभारत काल से की जाती है। कहते हैं कि छठ पूजा की शुरुआत सूर्य पुत्र कर्ण ने की थी। कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे। मान्याताओं के अनुसार वे प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्‍य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वे महान योद्धा बने थे।
राजपाठ वापसी के लिए द्रौपदी ने की थी छठ पूजा
इसके अलावा महाभारत काल में छठ पूजा का एक और वर्णन मिलता है। जब पांडव जुए में अपना सारा राजपाठ तब द्रौपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को अपना राजपाठ वापस मिल गया था।

मन की बात | अमन आकाश

थोरा सा शमय निकाल कर इसको परिए..😃 हाँ ठीक है हम बिहारी हैं.. बचपने से अइसे इस्कूल में पढ़े हैं, जहाँ बदमाशी करने पर माट साब "ठोठरी प...