मंगलवार, 11 जुलाई 2017
बचपन के दिन भले थे कितने | एक कविता बिहार से
बुधवार, 7 जून 2017
बागमती की सद्गति
बागमती की सद्गति पुस्तक दिनेश कुमार मिश्र की रचना है और बागमती हमारे लिए जीवन दायिनी नदी हुआ करती थी लेकिन आज से कई साल पहले हमारे लिए काफी बड़ी संकट थी बागमती में आने वाली बाढ़ । दिनेश मिश्र के प्रयासों से उस बागमती पर बाँध तल बनाया गया लेकिन किसानो को सिचाई हेतु नहर का समुचित प्रबंध नहीं किया गया जिसका परिणाम ये हुआ की आज हम खेती में पानी की कमी के कारन काफी पीछे हो गए ।आज पढ़िए दिनेश कुमार मिश्र की पुस्तक बागमती की सद्गति का कुछ अंश पसनद आये तो और भी लोगो को बताये और ज्यादावसे ज्यादा लोगो तक पहुचाये :-
बागमती परियोजना का निर्माण कार्य तीन स्तरों पर हुआ था। पहला निर्माण कार्य 1954-56 के बीच हायाघाट से लेकर बदलाघाट के बीच बनने वाले तटबंधों से शुरू हुआ। यह समय आजादी के लगभग ठीक बाद का था इसलिए उसकी रवानी में समाज और देश के काम आने की ललक हर आदमी में थी। यह वह समय था जब जनता सम्बंधित विभागों की योजनाओं पर विश्वास करती थी। जो नेता थे वह स्वतंत्रता आन्दोलन के तपे-तपाये लोग थे इसलिए उन पर भरोसा न करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। इस तरह से उस समय पुनर्वास के मसले पर न तो आम लोगों की कोई खास अपेक्षाएं थीं और न ही पुनर्वास को लेकर कोई खास झमेला हुआ। किसी को मुआवजे के तौर पर कुछ मिल गया तो ठीक वरना न मिलने पर भी किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की और इसे समाज तथा देश के व्यापक हित में अपना योगदान समझ कर संतोष कर लिया। उस समय के बचे हुए पुराने लोग कहते हैं कि जिस जमीन से होकर तटबंध गुजरा था उस जमीन का मुआवजा उन्हें मिला था और उसके अलावा उन्हें कुछ नहीं मिला। जिनका घर दोनों तटबंधों के बीच में पड़ गया उनमें कुछ को तटबंध के बाहर घर बनाने के लिए कुछ जमीन मिल गयी। घर बनाने के लिए किसी को कोई अनुदान नहीं मिला।
उन दिनों कोसी परियोजना में पुनर्वास का विषय जरूर कुछ चर्चा में आ गया था मगर निर्माणाधीन बागमती और बूढ़ी गंडक नदियों पर बन रहे तटबंध के समय पुनर्वास किसी चर्चा में नहीं था। वहाँ पुनर्वास के मसले को जैसे-तैसे निपटा देने की ही योजना थी। इस मुद्दे पर विधान सभा की कार्यवाही रपट में भी विशेष कुछ नहीं मिलता और निश्चयपूर्वक कुछ कह सकने वाले लोग भी बहुत कम ही बचे हैं। यह तटबंध बन जाने के कई वर्षों बाद 10 फरवरी 1965 को महावीर राउत ने विधान सभा में यह सवाल उठाया कि हायाघाट के नीचे जो लोग बांध के बीच में पड़ गए हैं उनकी हालत खराब हो गयी है और उनके बसने के लिए जमीन नहीं है। बांध बन जाने के कारण जमीन का दाम बढ़ कर 400 रुपये प्रति कट्ठा हो गया है। गरीब हरिजन इतना पैसा दे नहीं सकते। हसनपुर इलाके में 30-40 गाँवों के लोगों को बसाना होगा और सिंचाई विभाग तथा सरकार की यह जिम्मेवारी बनती है कि इन लोगों को जमीन दे। उन्होंने इस सवाल को एक बार फिर विधान सभा में 31 मार्च 1965 के दिन भी उठाया जिसके जवाब में सरकार की तरफ से महेश प्रसाद सिंह ने जरूर यह स्वीकार किया था कि करेह नदी के बांध से उजड़े हुए लोगों का कोई प्रबंध नहीं हो पाया है। यहाँ भूमिहीन लोग तटबंध पर ही रह रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि तृतीय पंचवर्षीय योजना में निधि के अभाव के कारण अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हो पायी है। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में निधि के उपलब्ध होने पर पुनर्वास की कार्यवाही की जायेगी। पुनर्वास के इस आश्वासन का मतलब था कि तटबंध का काम तो पहली पंचवर्षीय योजना में हो जाना था मगर पुनर्वास के लिए उसके बाद कम से कम 10 वर्ष इंतजार करना था। बागमती के निचले हिस्से में पुनर्वास का मसला एक बार फिर 17 फरवरी 1966 को उठा जब महाबीर राउत ने ही वहाँ तटबंधों पर बसे लोगों को सरकार द्वारा हटाये जाने की धमकी दिये जाने का सवाल उठाया। उनका कहना था कि ऐसे लोग बड़ी दयनीय स्थिति में जी रहे हैं और वहाँ से हटाये जाने पर उनकी हालत और बदतर होगी। सरकार की तरफ से जो जवाब दिये गए वे गोल-मटोल थे। ग्राम कुण्डल, सिंघिया प्रखण्ड, जिला समस्तीपुर के गंगेश प्रसाद सिंह बताते हैं, ‘‘...जब यह तटबंध बन रहा था तब हम लोग बच्चे थे और चौथी-पाँचवीं कक्षा में पढ़ते रहे होंगे। पिताजी बताते थे कि सरकार से मुआवजे की अपेक्षा लोगों को थी मगर सरकार का यह कहना था कि प्रभावित लोगों को बॉण्ड दिया जायेगा। बॉण्ड क्या होता है इसका मतलब ही लोगों को नहीं मालुम था। जो समझते भी थे उनको भी बॉण्ड देने में इतना परेशान किया गया कि वे लोग भी थक हार कर बैठ गए और ककड़ी के मोल जमीन हाथ से निकल गयी। पुनर्वास किसी को मिला नहीं और तटबंध और नदी के बीच रहने वाले अधिकांश लोग तटबंध या उसके बगल की जमीन पर ही घर बना कर रह रहे हैं। इनकी संख्या में हर साल वृद्धि होती है क्योंकि जहाँ-जहाँ गांव नदी की धारा से कटते हैं या डूबते हैं, वहाँ-वहाँ के लोग तटबंध पर चले आते हैं।’’
कुछ इसी तरह की व्यवस्था के बारे में बताते हैं करांची (प्रखण्ड बिथान, जिला समस्तीपुर) के पूर्व अध्यापक राम सुधारी यादव, जिनका कहना है, ‘‘...पुनर्वास तो एक औपचारिकता थी जिसे जैसे-तैसे पूरा कर दिया गया था। यहाँ तटबंध के किनारे घनी बस्तियाँ हैं। यह जमीन सरकारी है। बरसात में पूरा इलाका डूबता है क्योंकि बांध कहीं न कहीं टूटता ही है-उसका पानी आता है। बारिश का पानी है ही। किसी भी आपात् स्थिति का सामना करने के लिए तटबंध के ऊपर शरण ली जा सकती है। इसलिए लोग बांध के नजदीक रहना पसंद करते हैं। कुछ परिवारों ने बांध के आस-पास जमीन खरीद कर भी घर बना लिये हैं।’’
दीमोदर यादवबहुत से गाँवों का पुनर्वास हुआ ही नहीं और ऐसे गाँव अभी भी करेह के तटबंधों के बीच नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। ऐसा ही एक गांव है दरभंगा जिले के हायाघाट प्रखंड का अकराहा जो कि दरभंगा-समस्तीपुर रेल लाइन पर पुल संख्या 17 के पूरब में बसा हुआ है। यहाँ की अविश्वसनीय जीवन शैली के बारे में बताते हैं पचपन वर्षीय दामोदर यादव। वे कहते हैं, ‘‘...पुनर्वास तो कभी नहीं मिला। अगर मिला होता तो चले ही गए होते। हमारा गांव रेल लाइन के पूरब में है। कम से कम तीन महीनें तो पूरा पानी भरा रहता है। उस समय हम गांव छोड़ कर रेल लाइन पर या बांध पर चले जाते हैं। पानी घटता है तब लौटते हैं। बांध पर बाढ़ के समय तो सरकार रहने देती है मगर कहीं टूट-फूट हो जाए तब मरम्मत करने के लिए वहां से भी हटा देती है। हमलोगों की हालत 1987 के बाद से बहुत ज्यादा खराब हो गयी। यहां पास में खरसर के पास एक पंचफुट्टा (पांच फुट ऊँचा) बांध हुआ करता था। पानी ज्यादा बढ़ने पर उसके ऊपर से वह निकल जाया करता था और हमारे यहां पानी कम हो जाता था। 1987 के बाद सरकार द्वारा इसे ऊँचा और मजबूत बना दिया गया और तभी से हमारी बरबादी शुरू हो गयी। अब अगर पास में कहीं टूट जाए तो हमें फायदा होता है। दूर नीचे टूटने पर तो हमें कोई फायदा नहीं होता। जब बांध पर रहते हैं तो नाव से आकर घर-द्वार की हालत देख जाते हैं और फिर वापस बांध पर। तीन-चार महीनें तो बाहरी दुनियाँ से कोई संपर्क रहता ही नहीं है। गांव का प्राइमरी स्कूल भी इस दौरान बंद रहता है। ...एक ही फसल होती है यहां रब्बी की। गेहूँ, मकई के अलावा अब कुछ भी नहीं उपजता। बाहर जमीन है नहीं हमारी। रिलीफ आदि भी कुछ नहीं मिलता, कभी-कभी कोई मेहरबानी कर के कुछ दे गया तो बड़ी बात है। खर्चा-पानी के लिए तो गांव से बाहर निकलना ही पड़ता है। लहेरियासराय में मजदूरी कर लें या दिल्ली चले जायें। सिर्फ गेहूँ और मकई पैदा करके तो जीवन चलने वाला नहीं है। चावल खरीदना ही पड़ता है। रोजमर्रा की चीजों, शादी-ब्याह, जीवन-मरण सब के लिए तो नगद पैसा चाहिये। हमारे गांव के अधिकांश लोग दिल्ली के आस-पास सब्जी उगाने में मजदूरी करते हैं। गांव में कुछ लोगों के पास भैसें हैं-दूध होता है, लहेरियासराय में बेच लेते हैं। बरसात के महीनें में हम चाहे जहाँ भी रहें हमारा गांव से संपर्क बना रहता है। सुनते हैं कि बांध ऊँचा और मजबूत किया जायेगा। अगर ऐसा हुआ तो पानी हमारे घर के ऊपर से बहेगा और तब तो बांध पर ही रहना पड़ेगा क्योंकि हमारी हैसियत नहीं है कि कहीं अपनी जमीन खरीद कर घर बना लें।’’
तटबंधों के आस-पास या उनके अंदर जहाँ ऐसी स्थिति है, तटबंधों से दूर भी हालात कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। पुरानी बागमती का वह रास्ता जिससे वह बूढ़ी गंडक से मिलती थी, उसी के बायें किनारे का गाँव है हथौड़ी, मौजे धोबीपुर टोला, जिला दरभंगा-और यहीं कच्ची सड़क के दूसरी तरफ किशनपुर बैकुण्ठ गांव है, प्रखंड वारिस नगर, जिला समस्तीपुर। यह सड़क ही दोनों जिलों की सीमा बनाती है। बाढ़ के समय यहाँ गर्दन भर पानी रहता है। उस समय लोग यहां से उठ कर गांव के चौक के पास जहाँ सड़क ऊँची है, वहां चले जाते हैं अपने जानवरों के साथ। वहां भी पानी बढ़ता है तो चौकी पर ईंटें बिछा कर पहले अनाज बचाते हैं फिर उतनी सी ही जगह में पूरा परिवार रहता है। तब भी अगर पानी बढ़ता है तो वाटरवेज के बांध पर चले जाते हैं। पानी बहुत ज्यादा बढ़ने पर हथौड़ी कोठी के पास करेह नदी के बांध पर जगह मिल जाती है-जो यहां से 2-3 किलोमीटर पड़ता है। कुछ लोग बागमती के बांध पर मधुरापुर चले जाते हैं। तीन महीना इसी तरह यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ बिस्तर हटाने का इंतजाम करते बीत जाता है। अनाज रहता है मगर खाना बनाने का जुगाड़ नहीं बैठता। सारा जीवन नाव, बांस और तैरने पर निर्भर हो जाता है।
लक्ष्मी महतोयहां पानी करेह का ही आता है भले ही यह नदी हायाघाट के नीचे बंधी हुई है मगर इसका तटबंध कहीं न कहीं हर साल टूटता ही है। तटबंध टूटा और यहाँ लोगों की हालत खराब हुई। फिर भी बाढ़ के पानी से फायदा होता है कि फसल अच्छी हो जाती है। इधर दो साल से तटबंध नहीं टूटा है तो किसानों को सिंचाई का इंतजाम करना पड़ रहा है। सरकार की कोई व्यवस्था है नहीं। प्राइवेट बोरिंग से 75 रुपया प्रति घंटा पर सिंचाई होती है। 6 कट्ठा मकई की सिंचाई के लिए साढ़े तीन घंटा पानी देना पड़ता है। क्या बचेगा ऐसे में? स्टेट बोरिंग रहती तो इतना खर्चा नहीं पड़ता मगर उसके लिए भी बिजली चाहिये जिसकी न तो कोई निश्चितता है और न समय। दिन में तीन घंटा भी निश्चित समय तक बिजली रहे और सारे दिन न भी रहे फिर भी किसान का काम चलता मगर इतना भी नहीं हो पाता है। धोबीपुर टोला के लक्ष्मी महतो अपनी हालत बड़े दार्शनिक भाव से बताते हैं, ‘‘...मेरे पास जमीन नहीं है। बटइया करते हैं, मेहनत करते हैं, मगर जीते शान से हैं। मनखाप में एक साल में 12 से 15 मन अनाज मालिक को देना पड़ता है, बाकी उपज हमारी। साल में दो फसल होती है, काम चल जाता है। बटइया में आधी-आधी फसल बंटती है। खर्चा हर हालत में बटायीदार का होता है। ...खरसर में बागमती का मुँह खोल देने से तो यहाँ की हालत और भी खराब हो जायेगी। उस हालत में पुरानी बागमती के इस हिस्से पर भी बांध बनाना पड़ेगा। यह बात अलग है कि मिट्टी का बांध है तो टूटेगा ही। जब इस शरीर का ही कोई भरोसा नहीं है तो बांध का क्या भरोसा? देखिये, बांध कभी अपने से नहीं टूटता, तोड़ा जाता है। पब्लिक कुछ भी न करे तो भी बांध की रखवाली तो करती ही है।’’
बागमती परियोजना का निर्माण कार्य तीन स्तरों पर हुआ था। पहला निर्माण कार्य 1954-56 के बीच हायाघाट से लेकर बदलाघाट के बीच बनने वाले तटबंधों से शुरू हुआ। यह समय आजादी के लगभग ठीक बाद का था इसलिए उसकी रवानी में समाज और देश के काम आने की ललक हर आदमी में थी। यह वह समय था जब जनता सम्बंधित विभागों की योजनाओं पर विश्वास करती थी। जो नेता थे वह स्वतंत्रता आन्दोलन के तपे-तपाये लोग थे इसलिए उन पर भरोसा न करने का कोई सवाल ही नहीं उठता था। इस तरह से उस समय पुनर्वास के मसले पर न तो आम लोगों की कोई खास अपेक्षाएं थीं और न ही पुनर्वास को लेकर कोई खास झमेला हुआ। किसी को मुआवजे के तौर पर कुछ मिल गया तो ठीक वरना न मिलने पर भी किसी ने कोई शिकायत भी नहीं की और इसे समाज तथा देश के व्यापक हित में अपना योगदान समझ कर संतोष कर लिया। उस समय के बचे हुए पुराने लोग कहते हैं कि जिस जमीन से होकर तटबंध गुजरा था उस जमीन का मुआवजा उन्हें मिला था और उसके अलावा उन्हें कुछ नहीं मिला। जिनका घर दोनों तटबंधों के बीच में पड़ गया उनमें कुछ को तटबंध के बाहर घर बनाने के लिए कुछ जमीन मिल गयी। घर बनाने के लिए किसी को कोई अनुदान नहीं मिला।
उन दिनों कोसी परियोजना में पुनर्वास का विषय जरूर कुछ चर्चा में आ गया था मगर निर्माणाधीन बागमती और बूढ़ी गंडक नदियों पर बन रहे तटबंध के समय पुनर्वास किसी चर्चा में नहीं था। वहाँ पुनर्वास के मसले को जैसे-तैसे निपटा देने की ही योजना थी। इस मुद्दे पर विधान सभा की कार्यवाही रपट में भी विशेष कुछ नहीं मिलता और निश्चयपूर्वक कुछ कह सकने वाले लोग भी बहुत कम ही बचे हैं। यह तटबंध बन जाने के कई वर्षों बाद 10 फरवरी 1965 को महावीर राउत ने विधान सभा में यह सवाल उठाया कि हायाघाट के नीचे जो लोग बांध के बीच में पड़ गए हैं उनकी हालत खराब हो गयी है और उनके बसने के लिए जमीन नहीं है। बांध बन जाने के कारण जमीन का दाम बढ़ कर 400 रुपये प्रति कट्ठा हो गया है। गरीब हरिजन इतना पैसा दे नहीं सकते। हसनपुर इलाके में 30-40 गाँवों के लोगों को बसाना होगा और सिंचाई विभाग तथा सरकार की यह जिम्मेवारी बनती है कि इन लोगों को जमीन दे। उन्होंने इस सवाल को एक बार फिर विधान सभा में 31 मार्च 1965 के दिन भी उठाया जिसके जवाब में सरकार की तरफ से महेश प्रसाद सिंह ने जरूर यह स्वीकार किया था कि करेह नदी के बांध से उजड़े हुए लोगों का कोई प्रबंध नहीं हो पाया है। यहाँ भूमिहीन लोग तटबंध पर ही रह रहे हैं। उन्होंने आगे कहा कि तृतीय पंचवर्षीय योजना में निधि के अभाव के कारण अभी तक कोई कार्यवाही नहीं हो पायी है। चतुर्थ पंचवर्षीय योजना में निधि के उपलब्ध होने पर पुनर्वास की कार्यवाही की जायेगी। पुनर्वास के इस आश्वासन का मतलब था कि तटबंध का काम तो पहली पंचवर्षीय योजना में हो जाना था मगर पुनर्वास के लिए उसके बाद कम से कम 10 वर्ष इंतजार करना था। बागमती के निचले हिस्से में पुनर्वास का मसला एक बार फिर 17 फरवरी 1966 को उठा जब महाबीर राउत ने ही वहाँ तटबंधों पर बसे लोगों को सरकार द्वारा हटाये जाने की धमकी दिये जाने का सवाल उठाया। उनका कहना था कि ऐसे लोग बड़ी दयनीय स्थिति में जी रहे हैं और वहाँ से हटाये जाने पर उनकी हालत और बदतर होगी। सरकार की तरफ से जो जवाब दिये गए वे गोल-मटोल थे। ग्राम कुण्डल, सिंघिया प्रखण्ड, जिला समस्तीपुर के गंगेश प्रसाद सिंह बताते हैं, ‘‘...जब यह तटबंध बन रहा था तब हम लोग बच्चे थे और चौथी-पाँचवीं कक्षा में पढ़ते रहे होंगे। पिताजी बताते थे कि सरकार से मुआवजे की अपेक्षा लोगों को थी मगर सरकार का यह कहना था कि प्रभावित लोगों को बॉण्ड दिया जायेगा। बॉण्ड क्या होता है इसका मतलब ही लोगों को नहीं मालुम था। जो समझते भी थे उनको भी बॉण्ड देने में इतना परेशान किया गया कि वे लोग भी थक हार कर बैठ गए और ककड़ी के मोल जमीन हाथ से निकल गयी। पुनर्वास किसी को मिला नहीं और तटबंध और नदी के बीच रहने वाले अधिकांश लोग तटबंध या उसके बगल की जमीन पर ही घर बना कर रह रहे हैं। इनकी संख्या में हर साल वृद्धि होती है क्योंकि जहाँ-जहाँ गांव नदी की धारा से कटते हैं या डूबते हैं, वहाँ-वहाँ के लोग तटबंध पर चले आते हैं।’’
कुछ इसी तरह की व्यवस्था के बारे में बताते हैं करांची (प्रखण्ड बिथान, जिला समस्तीपुर) के पूर्व अध्यापक राम सुधारी यादव, जिनका कहना है, ‘‘...पुनर्वास तो एक औपचारिकता थी जिसे जैसे-तैसे पूरा कर दिया गया था। यहाँ तटबंध के किनारे घनी बस्तियाँ हैं। यह जमीन सरकारी है। बरसात में पूरा इलाका डूबता है क्योंकि बांध कहीं न कहीं टूटता ही है-उसका पानी आता है। बारिश का पानी है ही। किसी भी आपात् स्थिति का सामना करने के लिए तटबंध के ऊपर शरण ली जा सकती है। इसलिए लोग बांध के नजदीक रहना पसंद करते हैं। कुछ परिवारों ने बांध के आस-पास जमीन खरीद कर भी घर बना लिये हैं।’’
दीमोदर यादवबहुत से गाँवों का पुनर्वास हुआ ही नहीं और ऐसे गाँव अभी भी करेह के तटबंधों के बीच नारकीय जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं। ऐसा ही एक गांव है दरभंगा जिले के हायाघाट प्रखंड का अकराहा जो कि दरभंगा-समस्तीपुर रेल लाइन पर पुल संख्या 17 के पूरब में बसा हुआ है। यहाँ की अविश्वसनीय जीवन शैली के बारे में बताते हैं पचपन वर्षीय दामोदर यादव। वे कहते हैं, ‘‘...पुनर्वास तो कभी नहीं मिला। अगर मिला होता तो चले ही गए होते। हमारा गांव रेल लाइन के पूरब में है। कम से कम तीन महीनें तो पूरा पानी भरा रहता है। उस समय हम गांव छोड़ कर रेल लाइन पर या बांध पर चले जाते हैं। पानी घटता है तब लौटते हैं। बांध पर बाढ़ के समय तो सरकार रहने देती है मगर कहीं टूट-फूट हो जाए तब मरम्मत करने के लिए वहां से भी हटा देती है। हमलोगों की हालत 1987 के बाद से बहुत ज्यादा खराब हो गयी। यहां पास में खरसर के पास एक पंचफुट्टा (पांच फुट ऊँचा) बांध हुआ करता था। पानी ज्यादा बढ़ने पर उसके ऊपर से वह निकल जाया करता था और हमारे यहां पानी कम हो जाता था। 1987 के बाद सरकार द्वारा इसे ऊँचा और मजबूत बना दिया गया और तभी से हमारी बरबादी शुरू हो गयी। अब अगर पास में कहीं टूट जाए तो हमें फायदा होता है। दूर नीचे टूटने पर तो हमें कोई फायदा नहीं होता। जब बांध पर रहते हैं तो नाव से आकर घर-द्वार की हालत देख जाते हैं और फिर वापस बांध पर। तीन-चार महीनें तो बाहरी दुनियाँ से कोई संपर्क रहता ही नहीं है। गांव का प्राइमरी स्कूल भी इस दौरान बंद रहता है। ...एक ही फसल होती है यहां रब्बी की। गेहूँ, मकई के अलावा अब कुछ भी नहीं उपजता। बाहर जमीन है नहीं हमारी। रिलीफ आदि भी कुछ नहीं मिलता, कभी-कभी कोई मेहरबानी कर के कुछ दे गया तो बड़ी बात है। खर्चा-पानी के लिए तो गांव से बाहर निकलना ही पड़ता है। लहेरियासराय में मजदूरी कर लें या दिल्ली चले जायें। सिर्फ गेहूँ और मकई पैदा करके तो जीवन चलने वाला नहीं है। चावल खरीदना ही पड़ता है। रोजमर्रा की चीजों, शादी-ब्याह, जीवन-मरण सब के लिए तो नगद पैसा चाहिये। हमारे गांव के अधिकांश लोग दिल्ली के आस-पास सब्जी उगाने में मजदूरी करते हैं। गांव में कुछ लोगों के पास भैसें हैं-दूध होता है, लहेरियासराय में बेच लेते हैं। बरसात के महीनें में हम चाहे जहाँ भी रहें हमारा गांव से संपर्क बना रहता है। सुनते हैं कि बांध ऊँचा और मजबूत किया जायेगा। अगर ऐसा हुआ तो पानी हमारे घर के ऊपर से बहेगा और तब तो बांध पर ही रहना पड़ेगा क्योंकि हमारी हैसियत नहीं है कि कहीं अपनी जमीन खरीद कर घर बना लें।’’ तटबंधों के आस-पास या उनके अंदर जहाँ ऐसी स्थिति है, तटबंधों से दूर भी हालात कोई बहुत अच्छे नहीं हैं। पुरानी बागमती का वह रास्ता जिससे वह बूढ़ी गंडक से मिलती थी, उसी के बायें किनारे का गाँव है हथौड़ी, मौजे धोबीपुर टोला, जिला दरभंगा-और यहीं कच्ची सड़क के दूसरी तरफ किशनपुर बैकुण्ठ गांव है, प्रखंड वारिस नगर, जिला समस्तीपुर। यह सड़क ही दोनों जिलों की सीमा बनाती है। बाढ़ के समय यहाँ गर्दन भर पानी रहता है। उस समय लोग यहां से उठ कर गांव के चौक के पास जहाँ सड़क ऊँची है, वहां चले जाते हैं अपने जानवरों के साथ। वहां भी पानी बढ़ता है तो चौकी पर ईंटें बिछा कर पहले अनाज बचाते हैं फिर उतनी सी ही जगह में पूरा परिवार रहता है। तब भी अगर पानी बढ़ता है तो वाटरवेज के बांध पर चले जाते हैं। पानी बहुत ज्यादा बढ़ने पर हथौड़ी कोठी के पास करेह नदी के बांध पर जगह मिल जाती है-जो यहां से 2-3 किलोमीटर पड़ता है। कुछ लोग बागमती के बांध पर मधुरापुर चले जाते हैं। तीन महीना इसी तरह यहाँ से वहाँ और वहाँ से यहाँ बिस्तर हटाने का इंतजाम करते बीत जाता है। अनाज रहता है मगर खाना बनाने का जुगाड़ नहीं बैठता। सारा जीवन नाव, बांस और तैरने पर निर्भर हो जाता है।
लक्ष्मी महतोयहां पानी करेह का ही आता है भले ही यह नदी हायाघाट के नीचे बंधी हुई है मगर इसका तटबंध कहीं न कहीं हर साल टूटता ही है। तटबंध टूटा और यहाँ लोगों की हालत खराब हुई। फिर भी बाढ़ के पानी से फायदा होता है कि फसल अच्छी हो जाती है। इधर दो साल से तटबंध नहीं टूटा है तो किसानों को सिंचाई का इंतजाम करना पड़ रहा है। सरकार की कोई व्यवस्था है नहीं। प्राइवेट बोरिंग से 75 रुपया प्रति घंटा पर सिंचाई होती है। 6 कट्ठा मकई की सिंचाई के लिए साढ़े तीन घंटा पानी देना पड़ता है। क्या बचेगा ऐसे में? स्टेट बोरिंग रहती तो इतना खर्चा नहीं पड़ता मगर उसके लिए भी बिजली चाहिये जिसकी न तो कोई निश्चितता है और न समय। दिन में तीन घंटा भी निश्चित समय तक बिजली रहे और सारे दिन न भी रहे फिर भी किसान का काम चलता मगर इतना भी नहीं हो पाता है। धोबीपुर टोला के लक्ष्मी महतो अपनी हालत बड़े दार्शनिक भाव से बताते हैं, ‘‘...मेरे पास जमीन नहीं है। बटइया करते हैं, मेहनत करते हैं, मगर जीते शान से हैं। मनखाप में एक साल में 12 से 15 मन अनाज मालिक को देना पड़ता है, बाकी उपज हमारी। साल में दो फसल होती है, काम चल जाता है। बटइया में आधी-आधी फसल बंटती है। खर्चा हर हालत में बटायीदार का होता है। ...खरसर में बागमती का मुँह खोल देने से तो यहाँ की हालत और भी खराब हो जायेगी। उस हालत में पुरानी बागमती के इस हिस्से पर भी बांध बनाना पड़ेगा। यह बात अलग है कि मिट्टी का बांध है तो टूटेगा ही। जब इस शरीर का ही कोई भरोसा नहीं है तो बांध का क्या भरोसा? देखिये, बांध कभी अपने से नहीं टूटता, तोड़ा जाता है। पब्लिक कुछ भी न करे तो भी बांध की रखवाली तो करती ही है।’’ शनिवार, 11 फ़रवरी 2017
Kishanpur Baikunth Is Planning To Launch His Very Own Andriod Application
Today We Are Here To Inform You That Kishanpur Baikunth Is Planning To Launch His Very Own Andriod And Apple Application To All Of Our Sweet Village Person.
So Ladies And GentleMan May I Have Your Attention Please.↯↯
As You All Know That Kishanpur Baikunth Is Being Very Famouse Thease Days On Facebook So We Have Now Tied Up With FindingSaurabh Web Inc And Now We Are Going To Launch Our Andriod Application On Our 2nd Facebook Anniversary And That Is 4th June.
So All Of You Have To Make Pattence And Stay Tunned With Us Because We Are Making This Very Own Applicaton For You.
शनिवार, 19 नवंबर 2016
गाँव की लड़कियाँ | एक कविता बिहार से
Symbolic Image
संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह ‘आवाज भी देह है’ को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया तथा उन्हें जयपुर में दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। संजय औरंगाबाद दाउदनगर महाविद्यालय से सेवारत अध्यापक एस के शांडिल्य और अंकोढा मिडिल स्कूल में कर्यरत शिक्षिका मांडवी पांडेय के बडे पुत्र हैं। संजय अपने स्कूली जीवन से ही कविता लिखा करते थे। दाउदनगर के विवेकानंद मिशन स्कूल से शिक्षक के रुप में उन्होंने अपने कैरियर की शुरुवात की और अभी गोपालगंज सैनिक स्कूल में राजनीतिक शास्त्र शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। बिहारगीत भी उन्होंने ही लिखा था जिसके लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था। बोधि पुस्तक पर्व के चौथे सेट की दस और दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना के तहत प्रकाशित पांच पुस्तकों का लोकार्पण पिछले सोमवार (दिनांक ०७ नवम्बर २०१६ ) की शाम पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर के सभागार में हुआ।
संजय कुमार शांडिल्य की कविता संग्रह ‘आवाज भी देह है’ को बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया तथा उन्हें जयपुर में दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। संजय औरंगाबाद दाउदनगर महाविद्यालय से सेवारत अध्यापक एस के शांडिल्य और अंकोढा मिडिल स्कूल में कर्यरत शिक्षिका मांडवी पांडेय के बडे पुत्र हैं। संजय अपने स्कूली जीवन से ही कविता लिखा करते थे। दाउदनगर के विवेकानंद मिशन स्कूल से शिक्षक के रुप में उन्होंने अपने कैरियर की शुरुवात की और अभी गोपालगंज सैनिक स्कूल में राजनीतिक शास्त्र शिक्षक के रुप में कार्यरत हैं। बिहारगीत भी उन्होंने ही लिखा था जिसके लिए राज्य सरकार ने उन्हें सम्मानित भी किया था। बोधि पुस्तक पर्व के चौथे सेट की दस और दीपक अरोड़ा स्मृति पांडुलिपि प्रकाशन योजना के तहत प्रकाशित पांच पुस्तकों का लोकार्पण पिछले सोमवार (दिनांक ०७ नवम्बर २०१६ ) की शाम पिंकसिटी प्रेस क्लब, जयपुर के सभागार में हुआ।
कहते हैं की भारत की आत्मा हमारे गॉवों में बसती है , आज के माहौल में जहाँ नारीवाद का विष्कृत रूप दिखने को मिलता है , वहाँ हमे आइना दिखाती हुई संजय कुमारशांडिल्य की एक कविता बिहार से में यह कविता –
मैं कहूँ कि गाँव की लड़कियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है
गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लड़कियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक
दबंगों की बेहिस छेड़ को जमाने से ज्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लड़कियाँ
आप पूछोगे आपको कैसे पता है
गाँव की लड़कियाँ अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फर्क
मैं कहूँ कि गाँव की लड़कियाँ किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है
गाँव की लड़कियाँ खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूङी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं खरीदना होता है
गाँव की लड़कियाँ गाँव की लड़कियाँ होती हैं
खूब गहरी
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जङें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई
इन घनी लड़कियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं
आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?
बिहार विधानमंडल के इतिहास में जुड़ेगा नया अध्याय ,भवन का उद्घाटन आज
बिहार विधानमंडल के इतिहास में शनिवार को एक नया अध्याय जुड़ जाएगा। विधानमंडल के नए भवन का उद्घाटन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करेंगे। इसके लिए पूरा विधानमंडल भवन सज-धज कर तैयार हो गया है।उद्घाटन समारोह में विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी, विधानपरिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, नेता प्रतिपक्ष सुशील कुमार मोदी व प्रेम कुमार समेत सभी मंत्री और अधिकतर विधायक और विधान पार्षद मौजूद रहेंगे।चार सौ करोड़ की लागत से तैयार हुआ है भवनकरीब चार सौ करोड़ रुपए की लागत से यह बहुप्रतीक्षित विधानमंडल के नए भवन का निर्माण किया गया है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की रोक हटने के बाद निर्माण कार्य तेजी से चलाया जा रहा था।
शुक्रवार, 18 नवंबर 2016
मैं तेरे इश्क़ में सरमाया-दार बन के रहा | एक कविता बिहार से
हवा के होंट खुलें साअत-ए-कलाम तो आए,
ये रेत जैसा बदन आँधियों के काम तो आए|
बिहार के बेगुसराय में 1 जुलाई 1981 ई० को जन्में ग़ालिब अयाज़ जी जीविका के सिलसिले में दिल्ली में निवासित हैं| जीवन के मीठे और कटु अनुभवों को बहुत ही खूबसूरती से बयाँ करते हैं| कॉलेज के जमाने से लिखने का शौक चढ़ा और तभी से उर्दू पत्र-पत्रिकाओं में छपते आ रहे हैं| अब तक कोई किताब तो प्रकाशित नहीं की इन्होंने मगर इतनी जगह छप चुके हैं कि ग़ज़ल लिखने वालों में नाम और पहचान बना चुके हैं|
तो आइये आज पटनाबीट्स पर ‘एक कविता बिहार से’ में एक युवा गज़लकार ग़ालिब अयाज़ जी की ग़ज़ल का लुत्फ़ उठाते हैं, कठिन शब्दों के अर्थ के साथ|
ग़ज़ल 1
कभी गुमान कभी ए’तिबार बन के रहा,
दयार-ए-चश्म में वो इंतिज़ार बन के रहा|
हज़ार ख़्वाब मिरी मिलकियत में शामिल थे,
मैं तेरे इश्क़ में सरमाया-दार बन के रहा|
तमाम उम्र उसे चाहना न था मुमकिन,
कभी कभी तो वो इस दिल पे बार बन के रहा|
उसी के नाम करूँ मैं तमाम अहद-ए-ख़याल,
दरून-ए-जाँ जो मिरे सोगवार बन के रहा|
अगरचे शहर में ममनू थी हिमायत-ए-ख़्वाब,
मगर ये दिल सबब-ए-इंतिशार बन के रहा|
[दयार-ए-चश्म – House of Eyes, सरमाया-दार – Capitalist, बार – Load/ Burden, अहद-ए-ख़याल – Period of thought, दरून-ए-जाँ – Inside Life, सोगवार – Sad, ममनू – Prohibited, हिमायत-ए-ख़्वाब – Support of Dreams, सबब-ए-इंतिशार – Cause of Anarchy]
ग़ज़ल 2
हुस्न के ज़ेर-ए-बार हो कि न हो,
अब ये दिल बे-क़रार हो कि न हो|
मर्ग-ए-अम्बोह देख आते हैं,
आँख फिर अश्क-बार हो कि न हो|
कर्ब-ए-पैहम से हो गया पत्थर,
अब ये सीना फ़िगार हो कि न हो|
फिर यही रूत हो ऐन मुमकिन है,
पर तिरा इंतिज़ार हो कि न हो|
शाख़-ए-ज़ैतून के अमीं हैं हम,
शहर में इंतिशार हो कि न हो|
शेर मेरे संभाल कर रखना,
अब ग़ज़ल मुश्क-बार हो कि न हो|
[ज़ेर-ए-बार – Thankful, मर्ग-ए-अम्बोह – Death of Mob, कर्ब-ए-पैहम – Constant Pain, ऐन – Exact]
सोमवार, 14 नवंबर 2016
आज बिहार के इस जिला का 44वाँ स्थापना दिवस मनाया जा रहा है
समस्तीपुर भारत गणराज्य के बिहाप्रान्त में दरभंगा प्रमंडल स्थित एक शहर
एवं जिला है। समस्तीपुर के उत्तर में दरभंगा, दक्षिण में गंगा नदी और पटना जिला, पश्चिम में मुजफ्फरपुर एवं वैशाली, तथा पूर्व में बेगूसराय एवं खगड़िया जिले है। यहाँ शिक्षा का माध्यम हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी
है लेकिन बोल-चाल में बज्जिका और मैथिली बोली जाती है। मिथिला क्षेत्र के परिधि पर स्थित यह जिला उपजाऊ कृषि प्रदेश है। समस्तीपुर पूर्व मध्य रेलवे का मंडल भी है। समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेशद्वार भी
कहा जाता है।
एवं जिला है। समस्तीपुर के उत्तर में दरभंगा, दक्षिण में गंगा नदी और पटना जिला, पश्चिम में मुजफ्फरपुर एवं वैशाली, तथा पूर्व में बेगूसराय एवं खगड़िया जिले है। यहाँ शिक्षा का माध्यम हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी
है लेकिन बोल-चाल में बज्जिका और मैथिली बोली जाती है। मिथिला क्षेत्र के परिधि पर स्थित यह जिला उपजाऊ कृषि प्रदेश है। समस्तीपुर पूर्व मध्य रेलवे का मंडल भी है। समस्तीपुर को मिथिला का प्रवेशद्वार भी
कहा जाता है।
नामाकरण
समस्तीपुर का परंपरागत नाम सरैसा है। इसका वर्तमान नाम मध्य काल में बंगाल एवं उत्तरी बिहार के शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास ((१३४५-१३५८ ईस्वी) के नाम पर पड़ा है। कुछ लोगों का मानना है कि
इसका प्राचीन नाम सोमवती था जो बदलकर सोम वस्तीपुर फिर समवस्तीपुर और समस्तीपुर हो गया।
इसका प्राचीन नाम सोमवती था जो बदलकर सोम वस्तीपुर फिर समवस्तीपुर और समस्तीपुर हो गया।

इतिहास
समस्तीपुर राजा जनक के मिथिला प्रदेश का अंग रहा है। विदेह राज्य का अंत होने पर यह वैशाली गणराज्य का अंग बना। इसके पश्चात यह मगध के मौर्य, शुंग, कण्व और गुप्त शासकों के महान साम्राज्य का हिस्सा रहा।
ह्वेनसांग के विवरणों से यह पता चलता है कि यह प्रदेश हर्षवर्धन के साम्राज्य के अंतर्गत था। १३ वीं सदी में पश्चिम बंगाल के मुसलमान शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास के समय मिथिला एवं तिरहुत क्षेत्रों का
बँटवारा हो गया। उत्तरी भाग सुगौना के ओईनवार राजा (1325-1525 ईस्वी) के कब्जे में था जबकि दक्षिणी एवं पश्चिमी भाग शम्सुद्दीन इलियास के अधीन रहा।
ह्वेनसांग के विवरणों से यह पता चलता है कि यह प्रदेश हर्षवर्धन के साम्राज्य के अंतर्गत था। १३ वीं सदी में पश्चिम बंगाल के मुसलमान शासक हाजी शम्सुद्दीन इलियास के समय मिथिला एवं तिरहुत क्षेत्रों का
बँटवारा हो गया। उत्तरी भाग सुगौना के ओईनवार राजा (1325-1525 ईस्वी) के कब्जे में था जबकि दक्षिणी एवं पश्चिमी भाग शम्सुद्दीन इलियास के अधीन रहा।
समस्तीपुर का नाम भी हाजी शम्सुद्दीन के नाम पर पड़ा है। शायद हिंदू और मुसलमान शासकों के बीच बँटा होने के कारण ही आज
समस्तीपुर का सांप्रदायिक चरित्र समरसतापूर्ण है। ओईनवार राजाओं को कला, संस्कृति और साहित्य का बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। शिवसिंह के पिता देवसिंह ने लहेरियासराय के पास देवकुली की स्थापना
की थी। शिवसिंह के बाद यहाँ पद्मसिंह, हरिसिंह, नरसिंहदेव, धीरसिंह, भैरवसिंह, रामभद्र, लक्ष्मीनाथ, कामसनारायण राजा हुए। शिवसिंह तथा भैरवसिंह द्वारा जारी किए गए सोने एवं चाँदी के सिक्के यहाँ के इतिहास ज्ञान का अच्छा स्रोत है। अंग्रेजी राज कायम होने पर सन १८६५ में तिरहुत मंडल के अधीन समस्तीपुर अनुमंडल बनाया गया। बिहार राज्य जिला पुनर्गठन आयोग के रिपोर्ट के आधार पर इसे दरभंगा प्रमंडल के अंतर्गत १४ नवम्बर १९७२ को जिला बना दिया गया। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध हुए स्वतंत्रता आंदोलन में समस्तीपुर के क्रांतिकारियों ने महती भूमिका निभायी थी। यहाँ से कर्पूरी ठाकुर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं।
समस्तीपुर का सांप्रदायिक चरित्र समरसतापूर्ण है। ओईनवार राजाओं को कला, संस्कृति और साहित्य का बढ़ावा देने के लिए जाना जाता है। शिवसिंह के पिता देवसिंह ने लहेरियासराय के पास देवकुली की स्थापना
की थी। शिवसिंह के बाद यहाँ पद्मसिंह, हरिसिंह, नरसिंहदेव, धीरसिंह, भैरवसिंह, रामभद्र, लक्ष्मीनाथ, कामसनारायण राजा हुए। शिवसिंह तथा भैरवसिंह द्वारा जारी किए गए सोने एवं चाँदी के सिक्के यहाँ के इतिहास ज्ञान का अच्छा स्रोत है। अंग्रेजी राज कायम होने पर सन १८६५ में तिरहुत मंडल के अधीन समस्तीपुर अनुमंडल बनाया गया। बिहार राज्य जिला पुनर्गठन आयोग के रिपोर्ट के आधार पर इसे दरभंगा प्रमंडल के अंतर्गत १४ नवम्बर १९७२ को जिला बना दिया गया। अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध हुए स्वतंत्रता आंदोलन में समस्तीपुर के क्रांतिकारियों ने महती भूमिका निभायी थी। यहाँ से कर्पूरी ठाकुर बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं।
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